- 11वें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान जयपुर में जीवनशैली विकारों पर दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ
- पीसीओडी, बंध्यत्व एवं मूत्रजनित विकारों में आयुर्वेद के अनुभूत प्रयोगों पर हुआ गहन मंथन

जयपुर. 11वें आयुर्वेद दिवस के अवसर पर “जीवनशैली गत विकारों में आयुर्वेद की भूमिका” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय आयुर्वेद कार्यशाला का शुभारंभ गुरुवार को राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (मानद विश्विद्यालय), जयपुर के सभागार में हुआ। राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान एवं विश्व आयुर्वेद परिषद, राजस्थान के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस राष्ट्रीय कार्यशाला में देशभर से आए आयुर्वेद विशेषज्ञों, चिकित्सकों एवं शोधकर्ताओं ने जीवनशैली से उत्पन्न विकारों के आयुर्वेदिक प्रबंधन पर विचार-विमर्श किया।
कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान मानद विश्विद्यालय जयपुर के कुलपति प्रो. संजीव शर्मा उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता आयुर्वेद विश्वविद्यालय जोधपुर के कुलगुरु प्रो. गोविंद सहाय शुक्ला ने की। इस अवसर पर विशिष्ट अतिथि के रूप में सह आयोजन अध्यक्ष डॉ. सुमन शर्मा, विश्व आयुर्वेद परिषद के राष्ट्रीय सचिव डॉ. किशोरी लाल शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार शर्मा, प्रदेश महासचिव डॉ पवन सिंह शेखावत एवं चिकित्सक प्रकोष्ठ के प्रदेश प्रभारी डॉ. जे.एस. राजावत ने भगवान धन्वंतरि प्रतिमा समक्ष दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम की शुरुआत की।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्रो. संजीव शर्मा, कुलपति, राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान (मानद विश्विद्यालय), जयपुर ने कहा कि “आज की बदलती जीवनशैली ने अनेक ऐसे विकारों को जन्म दिया है, जो लंबे समय तक व्यक्ति के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। आयुर्वेद केवल रोग के उपचार तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण, रोग की रोकथाम और व्यक्ति की समग्र जीवनशैली में सुधार का विज्ञान है। इसलिए जीवनशैली विकारों के स्थायी एवं समग्र समाधान की दिशा में आयुर्वेद की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. गोविंद सहाय शुक्ला, कुलगुरु, आयुर्वेद विश्वविद्यालय, जोधपुर ने कहा कि “आयुर्वेद की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह रोग के साथ-साथ रोगी को समझने की दृष्टि प्रदान करता है। वर्तमान समय में जीवनशैली विकारों की बढ़ती चुनौती के बीच आयुर्वेद के सिद्धांतों को आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़कर जनस्वास्थ्य के लिए प्रभावी मॉडल विकसित करने की आवश्यकता है।”
सह आयोजन अध्यक्ष डॉ. सुमन शर्मा ने कहा कि “महिलाओं में पीसीओडी, बंध्यत्व तथा अन्य हार्मोनल एवं जीवनशैली संबंधी विकार तेजी से सामने आ रहे हैं। ऐसे में आयुर्वेद की आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या एवं पंचकर्म आधारित दृष्टि रोग के मूल कारणों पर कार्य करने का व्यापक अवसर प्रदान करती है।”
विश्व आयुर्वेद परिषद के राष्ट्रीय सचिव डॉ. किशोरी लाल शर्मा ने कहा कि “आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने के लिए उसके पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक प्रमाणों के साथ प्रस्तुत करना समय की आवश्यकता है। इस प्रकार की राष्ट्रीय कार्यशालाएं चिकित्सकों के अनुभव, शोध और व्यावहारिक ज्ञान को एक साझा मंच प्रदान करती हैं।”
विश्व आयुर्वेद परिषद, राजस्थान के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने कहा कि “जीवनशैली विकारों की चुनौती केवल चिकित्सा क्षेत्र की चुनौती नहीं, बल्कि सामाजिक एवं जनस्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। आयुर्वेद की जीवनशैली आधारित अवधारणाओं को जन-जन तक पहुंचाकर इन विकारों की रोकथाम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई जा सकती है।”
विश्व आयुर्वेद परिषद, राजस्थान के प्रदेश महासचिव डॉ. पवन सिंह शेखावत ने बताया कि “इस राष्ट्रीय कार्यशाला का उद्देश्य चिकित्सकों एवं शोधकर्ताओं को जीवनशैली विकारों के आयुर्वेदिक प्रबंधन से जुड़े व्यावहारिक अनुभव, नवीन शोध एवं उपचार पद्धतियों से परिचित कराना है। कार्यशाला में देश के विभिन्न क्षेत्रों से आए विशेषज्ञ अपने चिकित्सकीय अनुभव साझा कर रहे हैं, जिससे प्रतिभागियों को प्रत्यक्ष रूप से व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त हो रहा है।”
उन्होंने बताया कि कार्यशाला के प्रथम दिवस देश के प्रख्यात विशेषज्ञ डॉ. नारायण साहने एवं प्रो. के. भारती ने पीसीओडी, बंध्यत्व तथा मूत्रजनित विकारों सहित विभिन्न जीवनशैली संबंधी विकारों के आयुर्वेदिक प्रबंधन पर विशेष व्याख्यान दिए। विशेषज्ञों ने आहार-विहार, दिनचर्या, ऋतुचर्या, पंचकर्म तथा अन्य आयुर्वेदिक उपचार पद्धतियों के माध्यम से ऐसे विकारों के समग्र प्रबंधन की संभावनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
विश्व आयुर्वेद परिषद, राजस्थान के प्रदेश प्रभारी चिकित्सक प्रकोष्ठ डॉ. जे.एस. राजावत ने कहा कि “चिकित्सकों के लिए यह आवश्यक है कि वे जीवनशैली विकारों के उपचार के साथ रोगियों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए भी प्रेरित करें। आयुर्वेद का निवारक एवं स्वास्थ्यवर्धक दृष्टिकोण इस दिशा में अत्यंत उपयोगी है।”
कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि आधुनिक जीवनशैली में अनियमित खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव, अनियमित दिनचर्या एवं प्राकृतिक जीवनचर्या से दूरी जीवनशैली विकारों के प्रमुख कारकों में शामिल हैं। आयुर्वेद इन विकारों के प्रबंधन में व्यक्ति की प्रकृति, आहार, दिनचर्या और जीवनशैली को केंद्र में रखते हुए समग्र दृष्टिकोण अपनाता है।
कार्यशाला में चिकित्सकों, आयुर्वेद विशेषज्ञों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहभागिता की। दो दिवसीय कार्यशाला के दूसरे दिन भी विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ व्याख्यान, चिकित्सकीय अनुभवों का आदान-प्रदान एवं वैज्ञानिक विमर्श जारी रहेगा।
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