प्रदूषित हवा बिगाड़ रही मानव जीवन का गणित

साल 2013 से 2021 तक दुनिया में 59.1 फीसदी वायु प्रदूषण बढ़ा है, जिसमें भारत का भी उल्लेखनीय योगदान है। यदि भारत को वायु प्रदूषण कम करना है तो डब्ल्यूएचओ के निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा। अगर ऐसा संभव हो सका तो भारत के लोगों का जीवन 11.9 वर्ष तक बढ़ सकता है, जो यहां के मानव जीवन के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।

वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए दुनिया का सबसे बड़ा खतरा बना हुआ है। यह खतरा दुनिया भर में असमान रूप से फैला हुआ है। हालांकि वैश्विक जीवन प्रत्याशा पर इसका अधिकांश प्रभाव दुनिया के छह देशों बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, चीन, नाइजीरिया और इंडोनेशिया में सबसे ज्यादा है। वर्तमान में जो देश वायु प्रदूषण से सबसे अधिक प्रभावित हैं, उनके पास उन मूलभूत उपकरणों व संसाधनों का अभाव है, जिनसे वायु गुणवत्ता में सुधार किया जा सकता है। शिकागो विश्वविद्यालय की हालिया जारी रिपोर्ट के अनुसार, साल 2021 में जैसे-जैसे वैश्विक प्रदूषण बढ़ा, वैसे-वैसे मानव स्वास्थ्य पर इसका बोझ भी बढ़ता चला गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के नए दिशा-निर्देश कहते हैं कि वायु प्रदूषण को स्थायी रूप से कम करके प्रति व्यक्ति जीवन प्रत्याशा में 23 वर्ष तक की वृद्धि की जा सकती है। इससे दुनिया में संयुक्त रूप से करीब 17.8 बिलियन लोगों का जीवन सालाना बचाया जा सकता है।

वायु प्रदूषण का मानव जीवन चक्र पर प्रभाव धूम्रपान, शराब के उपयोग, दूषित पानी के तीन गुना से अधिक उपयोग और परिवहन दुर्घटनाओं के पांच गुना से भी अधिक भयानक है। वैश्विक जीवन प्रत्याशा पर वायु प्रदूषण का तीन चौथाई प्रभाव केवल छह देशों बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, चीन, नाइजीरिया और इंडोनेशिया में होता है। यहां लोग जिस हवा में सांस लेते हैं, उसके कारण वे अपने जीवन में एक से छह साल से अधिक समय खो देते हैं। शिकागो विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ मिल्टन फ्रीडमैन का कहना है कि ऊर्जा नीति संस्थानों ने अपने सहयोगियों के साथ कई रिसर्च किए हैं। पिछले पांच वर्षों में मीडिया को वायु गुणवत्ता व इसके परिणाम पर प्राप्त जानकारी को कवरेज करने के पर्याप्त अवसर मिले, लेकिन उसने इन अवसरों का पूरी तरह से लाभ नहीं उठाया, जिससे लोगों को अधिक जागरूक नहीं किया जा सका।

वास्तव में कई प्रदूषित देशों में बुनियादी ढांचे का अभाव है। एशिया और अफ्रीका महाद्वीप, दो इसके सबसे प्रभावी उदाहरण है। यहां प्रदूषण के कारण जीवन आयु करीब 92.7 प्रतिशत तक कम हो रही है या फिर खत्म हो रही है। एशिया और अफ्रीका की सरकारें अपने नागरिकों को क्रमश 6.8 प्रतिशत और 3.7 प्रतिशत स्वच्छ वायु गुणवत्ता ही प्रदान कर पा रही हैं। एशिया और अफ्रीका के कई देशों ने माना है कि उनके यहां 4.9 प्रतिशत से लेकर 35.6 प्रतिशत तक वायु प्रदूषण है, जिसके कारण उनका बुनियादी ढांचा कमजोर होता जा रहा है। एचआईवी, मलेरिया और तपेदिक जैसे रोगों के उन्मूलन के लिए दुनिया के पास एक बड़ा वैश्विक कोष है, जिसके तहत सालाना चार बिलियन अमेरिकी डॉलर का वितरण किया जाता है। वहीं वायु प्रदूषण के लिए पूरे अफ्रीका महाद्वीप को परोपकार निधि के तहत तीन लाख अमेरिकी डॉलर से भी कम मिलते हैं। चीन और भारत के बाहर एशिया को केवल 1.4 मिलियन अमेरिकी डॉलर मिलते हैं। क्लीन एयर फंड के अनुसार यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा को कुल 34 मिलियन अमेरिकी डॉलर प्राप्त होते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वसनीय, स्वच्छ और गुणवत्ता वाली हवा नागरिक समाज और सरकार के स्वच्छ वायु प्रयासों की रीढ़ हो सकती है। इसके लिए जुटाया जाने वाला डाटा वह जानकारी प्रदान कर सकता है, जो लोगों और सरकारों के पास अभी तक नहीं है। वैश्विक संगठन ईपीआईसी के अनुसार, वायु गुणवत्ता कार्यक्रम सहयोगात्मक रूप से बुनियादी ढांचे का निर्माण कर फंडिग बढ़ाते हुए बेहतर लक्ष्य प्राप्त करने में अहम भूमिका निभाने में योगदान दे रहा है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वायु प्रदूषण का घातक प्रभाव एशिया के चार सबसे प्रदूषित देश बांग्लादेश, भारत, नेपाल और पाकिस्तान में अधिक दिखाई देता है। प्रदूषण के कारण वैश्विक स्तर पर इन देशों के निवासियों की औसत आयु पांच वर्ष तक कम हो गई है। वहीं चीन में वायु प्रदूषण में कमी आने के बाद भी वहां अभी भी प्रदूषण कई गुना अधिक है, जिससे वहां के नागरिकों की जीवन अवधि 2.5 वर्ष तक कम हो गई है। वहीं दक्षिण-पूर्व एशिया को 0.9 प्रतिशत प्रदूषण के स्तर वाला माना जाता है। इसके कुछ क्षेत्रों में एक ही वर्ष में प्रदूषण कई गुना तक बढ़ गया है। यहां के प्रदूषित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की जीवन प्रत्याशा औसतन 2-3 वर्ष कम होने की आशंका है।

अफ्रीका के देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, खांडा और बुरुंडी में भी सर्वाधिक वायु प्रदूषण है। पिछले कुछ सालों में इन देशों में प्रदूषण का स्तर 12 गुना तक बढ़ गया है। इसके चलते यहां के लोगों का जीवन 5.4 वर्ष तक कम हो रहा है। लैटिन अमेरिका में सबसे प्रदूषित क्षेत्र ग्वाटेमाला, बोलीविया और पेरू हैं। इन क्षेत्रों में लोगों की औसत आयु तीन वर्ष तक कम हो रही है। वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका में स्वच्छ वायु अधिनियम के पारित होने से पूर्व 1970 की तुलना में 64.9 प्रतिशत कम वायु प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। हालांकि हालात यहां भी बहुत अच्छे नहीं हैं। यूरोप में लोगों को लगभग 23.5 प्रतिशत कम प्रदूषण का सामना करना पड़ रहा है। फिर भी यूरोप का 98.4 प्रतिशत हिस्सा अभी भी डब्ल्यूएचओ की नई गाइडलाइन को पूरा नहीं करता है। खराब हवा के कारण यूरोप के निवासी करीब सात महीने कम जीवन जी रहे हैं।

अगर भारत की बात करें तो यहां वायु प्रदूषण मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता जा रहा है। यहां करीब 67.4 प्रतिशत जनसंख्या उन प्रदूषित क्षेत्रों में निवास करती है, जहां वार्षिक औसत का प्रदूषण स्तर बहुत अधिक है। वायु प्रदूषण के कारण हृदय संबंधी बीमारियां औसत भारतीय जीवन को कम कर रही हैं। बच्चों में कुपोषण के कारण करीब 4.5 वर्ष और मातृ कुपोषण के कारण महिलाओं में 1.8 वर्ष तक जीवन प्रत्याशा कम हो रही है। समय के साथ वायु प्रदूषण में वृद्धि हुई है। साल 2013 से 2021 तक दुनिया में 59.1 फीसदी वायु प्रदूषण बढ़ा है, जिसमें भारत का भी उल्लेखनीय योगदान है। यदि भारत को वायु प्रदूषण कम करना है तो डब्ल्यूएचओ के निर्देशों का सख्ती से पालन करना होगा। अगर ऐसा संभव हो सका तो भारत के लोगों का जीवन 11.9 वर्ष तक बढ़ सकता है, जो मानव जीवन के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है।
अमित बैजनाथ गर्ग, वरिष्ठ पत्रकार

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