राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान में दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का समापन, 15 प्रतिभागियों ने लिया प्रशिक्षण

जयपुर. आयुर्वेद दिवस समारोह के अंतर्गत राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर के आयुर्वेद पाण्डुलिपि विज्ञान विभाग की ओर से आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शनिवार को समापन हुआ। 7 और 8 अगस्त को आयोजित इस कार्यशाला में देश के विभिन्न राज्यों से चयनित 15 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला का आयोजन ज्ञान-भारतम् के सहयोग से किया गया।
“पाण्डुलिपि-परख आयुर्वेद-वाङ्मय अनुसंधान : पाठविमर्श एवं तुलनात्मक वाङ्मय-अध्ययन का व्यावहारिक अनुशीलन” विषय पर आयोजित कार्यशाला में प्रतिभागियों को आयुर्वेद की प्राचीन पाण्डुलिपियों के अध्ययन, संरक्षण, पाठ-संशोधन और वैज्ञानिक संपादन का प्रशिक्षण दिया गया।
समापन समारोह में प्रोफेसर हेमंता कुमार ने प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने में युवा शोधकर्ताओं की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कार्यशाला में प्राप्त प्रशिक्षण का उपयोग शोध कार्य में करने का आह्वान किया।
प्रो. असित के. पांजा ने कहा कि आयुर्वेद की प्राचीन पाण्डुलिपियां हमारी महत्वपूर्ण ज्ञान-संपदा हैं। इनके व्यवस्थित अध्ययन और वैज्ञानिक संपादन से प्रामाणिक ज्ञान को सुरक्षित रखा जा सकता है। प्रो. अनीता शर्मा ने पाण्डुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण और वैज्ञानिक संपादन की आवश्यकता पर जोर दिया। प्रो. सर्वेश अग्रवाल ने शोधार्थियों को मूल पाण्डुलिपियों के अध्ययन और शोध की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया। प्रो. निशा गुप्ता ने भी प्रतिभागियों का उत्साहवर्धन करते हुए पाण्डुलिपि अध्ययन और शोध के क्षेत्र में निरंतर कार्य करने के लिए प्रेरित किया।
विशेषज्ञों ने दिया व्यावहारिक प्रशिक्षण
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने पाण्डुलिपियों में मौजूद अलग-अलग पाठों की पहचान, पुराने लेखन की समझ, लिप्यंतरण, पाठ-संशोधन और आलोचनात्मक संपादन की जानकारी दी। प्रतिभागियों को व्यावहारिक अभ्यास भी कराया गया। डॉ. प्रवीण कुमार बी., डॉ. विद्याधीश काशीकर, डॉ. राकेश नारायण वी. (CCRAS, नई दिल्ली) और डॉ. भुवनेश शर्मा (CCRAS, जयपुर) ने विभिन्न सत्रों में प्रशिक्षण दिया। शोध में AI टूल्स के उपयोग तथा पाण्डुलिपियों के संपादन की आधुनिक तकनीकों से भी प्रतिभागियों को अवगत कराया गया।
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