किराए की दोस्ती

संपर्कों से भरी दुनिया में मनुष्य का अकेलापन बढ़ रहा है। जिस समाज में कभी दोस्ती और पड़ोस बिना बुलाए साथ खड़े हो जाते थे, वहां अब साथ भी एक सेवा बनता जा रहा है। ‘किराए की दोस्ती’ इसी बदलती मानवीय दुनिया का आईना है।

कुछ साल पहले तक दोस्ती हमारे लिए कोई अलग रिश्ता नहीं थी, वह जीवन का ही हिस्सा थी। मोहल्ले मंा रहने वाला बच्चा दोस्त था, स्कूल की बेंच पर साथ बैठने वाला दोस्त था और शाम को घर के बाहर खेलने वाला भी। किसी को बुलाने के लिए फोन करने की जरूरत नहीं होती थी। बस घर के बाहर खड़े होकर आवाज लगा दी और दोस्त निकल आया। गर्मियों की शामें छतों पर बीतती थीं, सर्दियों की धूप आंगन में और छुट्टियां रिश्तेदारों के घर। किसी घर में शादी होती थी तो वह केवल उस परिवार की शादी नहीं रहती थी, पूरा मोहल्ला उसमें शामिल हो जाता था। कोई गीत गाने पहुंच जाता था, कोई काम में हाथ बंटाता था और कोई केवल बैठकर हंसी-मजाक करता हुआ भी उस आयोजन का हिस्सा बन जाता था। तब शायद हमें यह एहसास ही नहीं था कि हम एक ऐसी सामाजिक पूंजी के बीच रह रहे हैं, जिसकी कोई कीमत नहीं थी, लेकिन जिसकी जरूरत बहुत बड़ी थी।

अब अपने ही आसपास देखिए। जीवन आसान हुआ है, सुविधाएं बढ़ी हैं, आने-जाने और बातचीत के साधन बढ़े हैं, लेकिन लोगों के बीच सहज बैठना कम हुआ है। छोटे शहरों और कस्बों में भी शादी-ब्याह का तरीका बदल रहा है। कभी पड़ोस की महिलाएं अपने आप इकट्ठी होकर विवाह गीत गाती थीं। किसी को बुलाने के लिए बाकायदा कार्यक्रम नहीं बनाना पड़ता था। अब कई जगह विवाह गीतों के लिए बाहर से संगीत मंडली बुलाई जाती है। मेहमानों के स्वागत से लेकर कार्यक्रम के संचालन तक के लिए अलग-अलग सेवाएं उपलब्ध हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। बदलते समय के साथ सुविधाओं का आना स्वाभाविक है। लेकिन इस छोटे से बदलाव को जरा ध्यान से देखें तो इसमें हमारे समाज की बड़ी तस्वीर दिखाई देती है। जिन कामों को कभी परिवार और पड़ोस मिलकर कर लेते थे, उनके लिए अब बाजार से सेवा ली जा रही है। बात केवल शादी के गीतों तक नहीं है। खाना बनाने, सजावट करने, बच्चों की देखभाल करने, बुजुर्गों को अस्पताल ले जाने और किसी कार्यक्रम में साथ खड़े रहने तक के लिए सेवाएं उपलब्ध हैं। यानी धीरे-धीरे हमारे जीवन में वह काम भी बाजार के हिस्से बन रहे हैं, जिन्हें कभी रिश्ते निभाया करते थे।

यहीं से ‘किराए की दोस्ती’ का विचार सामने आता है। सुनने में यह बात थोड़ी अजीब लगती है कि दोस्त भी कभी किराए पर लिया जा सकता है। लेकिन यह कोई कल्पना नहीं है। जापान में ‘Ossan Rental’ नाम की वास्तविक सेवा चल रही है, जिसमें मध्यम आयु के पुरुषों को कुछ समय के लिए साथ रहने, बातचीत करने, घूमने या किसी काम में साथ देने के लिए बुक किया जा सकता है। इसकी शुरुआत ताकानोबु निशिमोतो ने 2012 में की थी। आज इसकी वेबसाइट एक घंटे के लिए 1,000 येन की दर और 15वें वर्ष में प्रवेश के साथ 40,000 से अधिक अनुरोधों का उल्लेख करती है। लोग इन साथियों को बातचीत करने, सलाह लेने, खरीदारी करने, घूमने, खेल देखने या केवल कुछ समय साथ बिताने के लिए बुलाते हैं। पहली नजर में यह बात बाजार की एक अजीब व्यवस्था जैसी लगती है। लेकिन थोड़ा गहराई से सोचें तो सवाल कुछ और निकलता है। आखिर कोई व्यक्ति किसी अजनबी से बात करने के लिए पैसे क्यों देगा? अपने ही परिवार में कोई न कोई होगा, कोई दोस्त होगा, कोई सहकर्मी होगा। फिर किसी अनजान व्यक्ति की जरूरत क्यों पड़ रही है?

शायद इसलिए कि परिचित रिश्तों के साथ केवल अपनापन नहीं आता, अपेक्षाएं भी आती हैं। परिवार के सामने हम एक भूमिका में होते हैं, बच्चों के सामने दूसरी, कार्यस्थल पर तीसरी और दोस्तों के सामने भी हमारे बारे में पहले से बनी हुई एक छवि होती है। किसी परिचित को अपनी परेशानी बताने से पहले मन में कई बातें चलती हैं। वह क्या सोचेगा, कहीं उसे बुरा तो नहीं लगेगा, कहीं वह मेरी बात किसी और से तो नहीं कह देगा। एक अजनबी के सामने इन आशंकाओं का कुछ हिस्सा कम हो जाता है। वह आपके अतीत को नहीं जानता, आपके परिवार को नहीं जानता और आपकी जिंदगी में आगे भी शायद उसकी कोई भूमिका न हो। इसलिए कई बार आदमी किसी ऐसे व्यक्ति से अपनी बात कह देता है, जिससे उसका कोई पुराना संबंध नहीं होता। उसे सलाह नहीं चाहिए होती, उसे केवल कुछ देर सुना जाना होता है। यही बात इस पूरी व्यवस्था को दिलचस्प बनाती है। असल में लोग दोस्त नहीं खरीद रहे, वे कुछ समय के लिए किसी की उपस्थिति खरीद रहे हैं। किसी का समय, ध्यान और साथ। दोस्ती और भाईचारे के बीच यही सबसे बड़ा अंतर है। दोस्ती में संबंध समय के साथ बनता है। उसमें झगड़े होते हैं, नाराजगी होती है, इंतजार होता है, मनाना होता है और धीरे-धीरे साझा स्मृतियां बनती हैं। किराए के साथ में शुरुआत और अंत पहले से तय होता है। फिर भी यह व्यवस्था उन लोगों के लिए उपयोगी हो सकती है जिनके पास उस समय कोई अपना उपलब्ध नहीं है।

भारत में भी इस तरह की सेवाएं अब दिखाई देने लगी हैं। उदाहरण के लिए एक भारतीय साहचर्य मंच, बातचीत, कॉफी पर मिलने और साथ घूमने जैसी सेवाओं के लिए प्रति घंटे शुल्क सूचीबद्ध करता है। अस्पताल या क्लिनिक में साथ जाने जैसी सेवाएं भी वहां उपलब्ध हैं। इसका अभी भारत में कोई बहुत बड़ा सामाजिक चलन नहीं है, लेकिन इसकी मौजूदगी को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। बाजार अक्सर उसी जरूरत को पहचानता है जिसे समाज में पर्याप्त रूप से जगह नहीं मिल पा रही होती।

अकेलापन अब केवल बुजुर्गों की समस्या नहीं माना जा सकता। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दुनिया में लगभग हर छह में से एक व्यक्ति अकेलेपन का अनुभव करता है और युवा लोगों में इसका स्तर विशेष रूप से चिंताजनक है। WHO यह भी मानता है कि अकेलापन केवल मन की स्थिति नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा सामाजिक प्रश्न है। भारत में युवाओं को लेकर सामने आए एक हालिया सर्वेक्षण में 24 राज्यों के 4,500 से अधिक युवाओं को शामिल किया गया। इसमें 15 से 29 वर्ष की आयु के लगभग 75 प्रतिशत युवाओं ने दोस्तों के बीच रहते हुए भी अकेलापन महसूस करने की बात कही। करीब 80 प्रतिशत युवाओं ने भावनात्मक परेशानी के समय परिवार की अपेक्षा दोस्तों की ओर पहले जाने की बात कही। यहां एक बात समझना जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं कि आज की पूरी पीढ़ी संवेदनहीन हो गई है। बल्कि तस्वीर कुछ उलटी है। युवाओं के लिए दोस्त अब भी बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन दोस्ती का माध्यम और उसका सामाजिक वातावरण बदल गया है। पहले दोस्ती के लिए साथ बैठना जरूरी था, अब फोन की स्क्रीन पर बातचीत हो सकती है। पहले किसी के दुख में उसके घर पहुंचना पड़ता था, अब एक संदेश भेजकर हाल पूछा जा सकता है। पहले दोस्त की नाराजगी आंखों के सामने दिखाई देती थी, अब वह केवल ‘seen’ में भी बदल सकती है। तकनीक ने दूरी कम की है, लेकिन हर बार आत्मीयता नहीं बढ़ाई है।शायद यही वजह है कि हमें अपने साहित्य और सिनेमा की पुरानी दोस्तियां आज कुछ ज्यादा ही सच्ची लगती हैं। कृष्ण और सुदामा की कहानी में दोस्ती किसी लाभ की अपेक्षा पर नहीं टिकी। प्रेमचंद की ‘पंच परमेश्वर’ में मित्रता केवल साथ बैठने का नाम नहीं, बल्कि संबंध और जिम्मेदारी की कसौटी है। ‘शोले’ के जय और वीरू को याद कीजिए। उनकी दोस्ती इसलिए महत्वपूर्ण नहीं थी कि वे हमेशा साथ घूमते थे, बल्कि इसलिए कि संकट की घड़ी में एक दूसरे के लिए खड़े होते थे। ‘दिल चाहता है’ में तीन दोस्तों की जिंदगी अलग-अलग दिशाओं में जाती है, फिर भी उनके बीच वर्षों की साझा स्मृतियां बनी रहती हैं। ‘3 इडियट्स’ में दोस्ती उस समय सहारा बनती है जब शिक्षा, प्रतियोगिता और भविष्य का दबाव व्यक्ति को भीतर से तोड़ने लगता है। इन कहानियों में दोस्ती कोई सेवा नहीं थी। वह जीवन की कठिन परिस्थितियों से निकलने का एक रास्ता थी।

लेकिन क्या यह कहना सही होगा कि पहले सब कुछ अच्छा था और आज सब खराब हो गया है? शायद नहीं। पुराने समाज में भी अकेलापन था, रिश्तों में तनाव था, परिवारों में दूरी थी और हर व्यक्ति के पास सच्चे दोस्त नहीं होते थे। फर्क यह था कि सामाजिक जीवन में ऐसे कई अनौपचारिक सहारे मौजूद थे जिनके लिए किसी अनुबंध की जरूरत नहीं पड़ती थी। पड़ोसी, रिश्तेदार, मोहल्ला और समुदाय व्यक्ति के जीवन में स्वाभाविक रूप से उपस्थित रहते थे। आज व्यक्ति पहले से अधिक स्वतंत्र है, उसकी निजता अधिक मजबूत है और वह अपने जीवन के बारे में अधिक फैसले स्वयं लेता है। लेकिन इसके साथ संबंधों को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी उसी पर आ गई है। यदि समय नहीं है तो संबंध धीरे-धीरे पीछे छूट सकते हैं।अपने छोटे शहर और कस्बों की किसी शाम को देखिए। पहले घरों के बाहर चारपाइयां बिछती थीं। कोई पड़ोसी आकर बैठ जाता था। बच्चों को पता रहता था कि किस घर में जाकर खेलना है। अब उसी जगह घरों के भीतर अलग-अलग स्क्रीन चमकती दिखाई देती हैं। बच्चे अपने कमरे में हैं, माता-पिता अपने फोन में और बुजुर्ग टीवी के सामने। सब एक ही घर में हैं, फिर भी हर व्यक्ति अपनी-अपनी दुनिया में। यह दृश्य किसी बड़े महानगर का होना जरूरी नहीं है। हमारे कस्बों में भी यह बदलाव धीरे-धीरे दिखाई देने लगा है।

इसलिए ‘किराए की दोस्ती’ को केवल एक विदेशी विचित्रता मानकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन शायद यह हमारे अपने भविष्य की एक छोटी-सी झलक है। आज हम शादी में गीत गाने के लिए मंडली बुलाते हैं, किसी समारोह के लिए एंकर बुलाते हैं, अस्पताल में साथ जाने के लिए सेवा लेते हैं और अकेलेपन के लिए भाईचारा खरीदने की शुरुआत भी देख रहे हैं। हो सकता है कल इन सेवाओं की संख्या और बढ़े। सवाल यह नहीं कि इन सेवाओं की जरूरत क्यों पैदा हुई। सवाल यह है कि क्या हमारे अपने सामाजिक रिश्तों में वह जगह खाली होती जा रही है जिसे अब बाजार भरने लगा है।

समय नहीं, भावनाएं भाग रही हैं। आधुनिकता के इस दौर में कहीं भीतर से मानवता भी भाग रही है। वक्त रहते संभल जाएं तो अच्छा है, वरना एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब मनुष्य को मनुष्य की नहीं, मशीन की जरूरत होगी। मशीन हमारी बात सुन सकती है, जवाब दे सकती है, हमारे साथ बातचीत भी कर सकती है, लेकिन वह उस पड़ोसी की जगह नहीं ले सकती जो बिना बुलाए दरवाजे पर आकर पूछ ले, “सब ठीक तो है?” वह दोस्ती की उस चुप्पी की जगह नहीं ले सकती जिसमें दो लोग बिना कुछ कहे भी एक-दूसरे को समझ लेते हैं। शायद आने वाले समय में सबसे मूल्यवान चीज कोई महंगी सुविधा नहीं, बल्कि मनुष्य का वह स्वाभाविक साथ होगा जिसके लिए न कोई ऐप चाहिए, न कोई बुकिंग और न कोई भुगतान। क्योंकि अंत में मनुष्य को केवल किसी का साथ नहीं चाहिए, उसे यह भरोसा चाहिए कि किसी के लिए उसका होना मायने रखता है।

डॉ अर्चना गोदारा, सहायक आचार्य-समाजशास्त्र, स्वतंत्र लेखक

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