वेक्सीन की मारामारी!

शिव दयाल मिश्रा
जिस
समय कोरोना महामारी के शुरुआती दिन चल रहे थे। तब हर कोई यह सोच रहा था कि कोरोना की कोई वेक्सीन आ जाए ताकि इस महामारी से बचा जा सके। सरकार ने जितना जल्दी हो सकता था, वेक्सीन उपलब्ध करवा दी। जब वेक्सीन आ गई तो उस पर तरह-तरह के सवाल उठने लगे। तरह-तरह की भ्रांति फैलाई गई। यहां तक कि वेक्सीन को एक पार्टी विशेष की वेक्सीन बताई गई। देश के प्रधानमंत्री को टीवी पर आकर वेक्सीन लगवाने की अपील करनी पड़ी। उसके बाद लोगों को वेक्सीन लगवाने की समझ आई। सबसे पहले कोरोना में फ्रंट लाइन कर्मचारियों को वेक्सीन लगाई गई। उसके बाद वेक्सीन लगवाने के लिए क्रमवार उम्र के हिसाब से व्यवस्था की गई। ताकि ये नहीं कहा जा सके कि अपने लोगों को वेक्सीन लगवा दी। जो लोग इस वेक्सीन का विरोध कर रहे थे वे सब इस समय वेक्सीन लगवा रहे हैं या लगवा चुके हैं। एक समय था जब सरकारी डिस्पेंसरियों पर वेक्सीन लगवाने के लिए इक्के-दुक्के लोग जा रहे थे और आज स्थिति ये हो गई है कि सुबह 5-6 बजे से वेक्सीन के लिए लोग लाइन में लग जाते हैं। जगह-जगह शिविर आयोजित किए जा रहे हैं, मगर वेक्सीन लगवाने के लिए नंबर ही नहीं आ रहा है। कई शिविरों में तो लड़ाई-झगड़े तक हो जाते हैं, जिसके कारण पुलिस भी बुलानी पड़ जाती है। आम आदमी तो नि:शुल्क ही वेक्सीन लगवाना चाहेगा। धनाढ्य वर्ग तो हजार-बारह सौ रुपए खर्च कर निजि अस्पतालों में आसानी से वेक्सीन उपलब्ध हो रही है, लगवा रहे हैं। हालांकि बीच-बीच में अखबारों में पानी के इंजेक्शन लगाए जाने की भी खबरें पढऩे को मिल जाती है। कुछेक खबरें खाली सिरींज ही चुभोने की पढऩे में आई थी। खैर ये एक जांच का विषय है। मगर इन दिनों वेक्सीन लगवाने की जद्दोजहद बढ़ती जा रही है। कुछ दिनों पहले सरकार ने यह निर्णय लिया था कि वेक्सीन सिर्फ सरकारी अस्पताल एवं डिस्पेंसरियों में ही लगाई जाएगी और वेक्सीन के लिए किसी संस्था को शिविर लगाने की अनुमति नहीं मिलेगी। मगर ऐसा नहीं हो सका। पुन: शिविर आयोजित होने लगे हैं और उन शिविरों में जान-पहचान वालों के वेक्सीन लग रही है। बिना जान-पहचान वाले लोग सुबह से शाम तक वेक्सीन लगवाए बिना ही बैठकर आ जाते हैं। वेक्सीन लगवाने वालों की लाइनों को देखकर नोटबंदी के समय लगने वाली लाइनें याद आ जाती है। उस समय तो समाजसेवी लोग लाइनों में लगे लोगों को चाय, पानी, बिस्किुट एवं छाया की व्यवस्था भी करते देखे गए। मगर इस समय तो ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिल रहा है। इस समय तो हालात ये हैं कि खाते रहो धक्के और लगवाते रहो वेक्सीन। भगवान भरोसे!
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