रिश्वत तेरे रूप अनेक!

शिव दयाल मिश्रा
एक कहावत है जिसे मौके-बे-मौके किसी को भी कहते सुना जा सकता है। रिश्वत भी गिरगिट की तरह रंग बदलती रहती है। समय और परिस्थिति के अनुसार रिश्वत भी रंग बदलती रहती है। रिश्वत को कभी सहायता के रूप में तो कभी प्रोत्साहन के रूप में तो कभी सुविधा शुल्क तो कभी शुद्ध रिश्वत के रूप में दिया और लिया जाता है। समाचारों में कई बार सामने आता है कि सरकारी कर्मचारी रिश्वत लेते पकड़ा गया और नौकरी से भी हाथ धो बैठा। कई ठेकेदार रिश्वत के बलबूते घटिया निर्माण का बिल भी उठा लेते हैं। रिश्वत में वो ताकत है कि घटिया भी सही प्रमाणित हो जाता है। राजनीति में भी चुनाव लडऩे वाला प्रत्याशी खोटा होने पर भी रिश्वत के बल पर खरा साबित हो जाता है। राजनीतिक पार्टियों द्वारा चुनावों के समय वोट लेने के लिए कभी लैपटॉप, साइकिल स्कूटी, फ्री की बिजली, बैंकों का लोन माफ कर देना आम बात है। क्या इसे रिश्वत नहीं कह सकते। ऐसी घोषणाओं से क्या निष्पक्ष चुनाव हो सकते हैं। चुनाव आयोग को इस ओर जरूर संज्ञान लेना चाहिए। सरकार के पास काम करने के लिए पूरा समय होता है उस समय योजनाबद्ध तरीके से विकास कार्य किए जा सकते हैं। मगर ऐन चुनाव के समय ये फ्री, वो फ्री, ये सहायता, वो सहायता की घोषणाएं होती रहती हैं। आम जनता की गाढ़ी कमाई जो टैक्स के रूप में विकास कार्यों के लिए दिया जाता है, फ्री में निठल्ले लोगों के लिए चला जाता है। ऐसे निठल्ले लोग फ्री के चक्कर में बैंक के लोन नहीं चुकाते, काम नहीं करते, अपनी जिम्मेदारियों से दूर भागते हैं और फ्री के चक्कर में कई बुरे ऐब भी लगा लेते हैं। अनाज फ्री में, बिजली फ्री में, सामाजिक सुरक्षा के नाम पर पेंशन फ्री में मिलती रहती है तो फिर वो काम क्यूं करेंगे। दो रुपए किलो गेहूं, चार रुपए किलो दाल, एक रुपए किलो चावल मिलता रहता है। ऐसे में निठल्ले शराबी की पत्नी और बच्चे फ्री का सामान लेने के लिए लाइनों में लगे रहते हैं और घर का मुखिया शराब पीकर नालियों में पड़ा रहता है। ऐसे लोगों के वोटों के बूते नाकारा लोग भी चुनाव जीत जाते हैं और फिर वे भी अपनी जेबें भरने के लिए ऐसे ही उल्टे-सीधे हथकंडे अपनाते हैं। होना तो यह चाहिए कि जनता की गाढ़ी कमाई से रोजगारोन्मुखी कल-कारखाने खोले जाने चाहिए ताकि रोजगार उपलब्ध हो। विकास कार्यों जैसे रेल, सड़क, बांध, बिजली उत्पादन आदि इकाईयां लगाई जानी चाहिए। चुनाव आयोग को वोट के लिए की जाने वाली फ्री की घोषणाओं पर रिश्वत समझ कर रोक लगाने का कोई रास्ता ढूंढऩा होगा, तभी निश्चित रूप से निष्पक्ष और सही प्रत्याशी का चुनाव हो पाएगा।
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