मसालों के निर्यात के लिये पेस्टीसाईड्स के अन्तर्राष्ट्रीय प्रचलित मानकों के अनुसार मानक बनायें जायेंगे

फूड सेफ्टी एण्ड स्टैण्डर्ड अथॉरिटी द्वारा मीटिंग में एफएसएसएआई अथॉरिटी के सी.ई.ओ. श्री जी. कमला वर्धना राव ने यह उद्गार व्यक्त किये कि भारतीय उत्पादित मसालों के लिये अन्तर्राष्ट्रीय प्रचलित मानक निर्धारित किये जायेंगे। श्री राव ने एवरेस्ट मसाला तथा एमडीएच मसाला के प्रतिनिधियों को उलाहना देते हुए कहा कि हांगकांग से आयी मसाला फैल होने की सूचना के जवाब में कोई जवाब आप लोगों द्वारा नहीं दिया गया, जिस पर दोनों ने ही सोशल मीडिया में विरोध करने की बात कही। हांगकांग से मसाला जांच रिपोर्ट आज तक उपलब्ध नहीं हुई है। भारतीय एग्रीकल्चर बोर्ड द्वारा इसका प्रतिवाद किया गया है।

आयोजित मीटिंग में भारतीय उद्योग व्यापार मण्डल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबूलाल गुप्ता तथा राष्ट्रीय महामंत्री मुकुन्द मिश्रा के नेतृत्व में प्रतिनिधिमण्डल के रूप में श्यामधनी मसाला के रामावतार अग्रवाल, एमडीएच मसाला के सुरेश राठी, सीबा ताजा मसाला के शशांक झालाणी, एवरेस्ट मसाला के शैलेष शाह, गजानन मसाला के समीर भाई, इतिहास मसाला के कृपाराम तथा बीयूवीएम दिल्ली के अध्यक्ष प्रेम अरोड़ा, महामंत्री हेमन्त गुप्ता तथा बीयूवीएम राजस्थान के विट्ठल अग्रवाल उपस्थित रहे। बीयूवीएम के राष्ट्रीय अध्यक्ष बाबूलाल गुप्ता ने श्री राव को समस्याओं से संबंधित प्रतिवेदन प्रस्तुत किया तथा साबुत मसालों की जांच रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए निवेदन किया कि साबुत मसालों में पेस्टीसाईड्स पाया गया है तो पिसे हुये मसालों में पेस्टीसाईड्स आना लाजिमी है।

श्री गुप्ता ने कहा कि विदेशों से आयी खबर के आधार पर एफएसएसएआई द्वारा सारे भारत में मसालों के नमूने लेकर पेस्टीसाईड्स जांच करने के आदेश दिये। जिस पर करीब 5 हजार नमूने देशभर में लिये गये। इसकी पुष्टि श्री राव ने भी की।

श्री गुप्ता ने अपने मेमोरेण्डम पर प्रकाश डालते हुए निवेदन किया कि किसान बुवाई करता है तो मिट्टी में उर्वरता बनी रहे, के लिये यूरिया (पेस्टीसाईड्स) का उपयोग करता है ताकि जमीन में उर्वरता बनी रहे और पौधा उगने में सहायता मिल सकें। पौधा बड़ा होने पर पौधे पर फूल-फल आते हैं। इन पर विभिन्न प्रकार के कीड़े-मकौडे़ आक्रमण करते हैं। इनसे बचाने के लिये किसान कीटनाशक का छिड़काव करता है। मिट्टी पर डाला हुआ पेस्टीसाईड्स पौधे की जड़ों के माध्यम से तथा फूल एवं फल पर डाला हुआ कीटनाशक फूल एवं फल के माध्यम से उत्पाद में पहुंच जाता है। इसलिये यह पेस्टीसाईड्स किसान के स्तर पर ही उत्पाद में आ जाता है। फैक्ट्रियों के स्तर पर कोई भी पेस्टीसाईड्स न तो काम में लिया जाता है और न ही मिलाया जाता है।

फैक्ट्रियों से एवं व्यापारियों से सैम्पल लिये गये; और साथ ही यह प्रचार किया गया कि मसालों में मिलावट है, यह खाने योग्य नहीं है, एवं यह कैंसर पैदा करते हैं। इस तरह के मिथ्या प्रचार से बरसों तपस्या कर जो ब्राण्ड बनाये गये थे, उनकी इज्जत को धक्का लगा और उपभोक्ता ने एक प्रश्न खड़ा कर दिया कि ब्राण्डेड कंपनियों के मसाले मिलावटी है एवं खाने योग्य नहीं है।

श्री गुप्ता ने मांग की कि फैक्ट्रियों के स्तर पर कोई पेस्टीसाईड्स नहीं मिलाया गया हैं क्योंकि पेस्टीसाईड्स फैक्ट्रियों में मिल ही नहीं सकता। इसलिये जो सैंपल एफएसएसएआई द्वारा लिये गये हैं, उन्हें सर्विस सैम्पल मानकर निरस्त किये जायें। उन्हंें मुकदमे बनाने में काम में नहीं लिये जायें और इस संबंध में एक एडवायजरी एफएसएसएआई द्वारा जारी की जायें।

श्री गुप्ता ने यह भी बताया कि पूरे भारत में पेस्टीसाईड्स जांच करने की कुल 31 लेबोरेट्रीज है। राज्यों में लिये गये सैंपल प्राईवेट लेबोरेट्रीज में ही जांच के लिये दिये जाते हैं। इसलिये लेबोरेट्रीज की संख्या बढ़ायी जानी चाहिये, ताकि उद्योग अपने उत्पाद जांच कर बाजार में उतार सकें। श्री गुप्ता ने यह भी कहा कि पेस्टीसाईड्स की जांच रिपोर्ट 14दिन में आती है इसे कम किया जाना चाहिये। पेस्टीसाईड्स के 0.1 प्रतिशत मानक रिसर्च आधारित नहीं है। इसे अलग-अलग जिंसों पर जांचकर अलग-अलग मानक तैयार किये जाने चाहिये। श्री गुप्ता ने यह भी कहा कि साबुत मसालों के मानक पुनः रिसर्च के लिये दिये जाने चाहिये। एफएसएसएआई मानकों के अनुसार लौंग का हैड 2 प्रतिशत ही टूटा हुआ होना चाहिये। जबकि पैकिंग में एवं उठापठक में वो हैड 8 से 10 प्रतिशत टूट जाता है। इस कारण लौंग की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं आती है। निवेदन यह भी किया कि लाईसेन्स को आजीवन कर दिया जाना चाहिये। लाईसेन्स ग्रेन ट्रेडर के लिये भी नहीं है। यह केवल मैन्यूफैक्चरर्स, इम्पोर्टर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स के लिये हैं।

श्री राव ने कहा कि आपने यहां उपस्थित सभी स्टेकहोल्डर्स के मुद्दे उठायें हैं। एमडीएच मसाला तथा एवरेस्ट मसालों पर विदेशों में प्रश्नचिह्न खड़े किये गये हैं। उसके जवाब इन कंपनियों ने नहीं दिये। इनके जवाब भी एग्रीकल्चर बोर्ड से दिलवाने पड़े। हांगकांग के सैम्पलों की रिपोर्ट अभी नहीं आयी है। विदेशों में एमडीएच तथा एवरेस्ट मसालों में पेस्टीसाईड्स होने की सूचना हांगकांग से आने पर भारत के सभी प्रांतों से 5 हजार सैम्पल लिये गये, जिनमें कुछ में पेस्टीसाईड्स हो सकता है। यह मानकर विचार बना है कि पेस्टीसाईड्स के मानकों को पुनः लिखा जाना चाहिये। सभी सैम्पल्स मुकदमा बनाने के लिये काम में नहीं लिये जायेंगे, ऐसा आश्वासन भी दिया गया। श्री राव ने कहा कि एफएसएसएआई की मंशा न तो उद्योग को परेशान करने की हैं और न ही अनावश्यक सैम्पल लेकर माहौल क्रिएट करने की है। परन्तु व्यापार मण्डल का भी दायित्व बनता है कि कन्ज्यूमर को शुद्ध मसाले उपलब्ध हो, यह सुनिश्चित करें। तथा किसानों को समझाइश कर कम पेस्टीसाईड्स डालने के लिये प्रोत्साहित करें। कृषि विभाग और व्यापार मण्डल के साथ एक साझी मीटिंग भी बुलायी जा सकती है।

उपस्थित सभी सदस्यों ने श्री राव का मसालों में पेस्टीसाईड्स हैं, के संबंध में सकारात्मक सोच रखने, नये मानक निर्धारित करने तथा उठाये गये सैम्पलों पर मुकदमा नहीं बनाने के आश्वासन पर धन्यवाद ज्ञापित किया।

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