भारत मे आज ही के दिन कांग्रेस ने आपातकाल लगाया था जिसके विरोध में आज भाजपा ने काला दिवस मनाया

भारत मे आज ही के दिन कांग्रेस ने आपातकाल लगाया था जिसके विरोध में आज भाजपा ने काला दिवस मनाया

बीकानेर@जागरूक जनता। भारतीय जनता पार्टी बीकानेर देहात ने 1975, में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कहने पर धारा 352 के अधीन तत्कालीन राष्ट्रपति फखरूद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा की। जिसके विरोध में भाजपा ने काला दिवस मनाया उसके तहत भाजपा बीकानेर देहात ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मीडिया को सामने जिलाध्यक्ष ताराचंद सारस्वत विधायक बिहारीलाल बिश्नोई महामंत्री कुम्भाराम सिद्ध जिला मंत्री देवीलाल व संभाग मीडिया प्रभारी मुकेश आचार्य उपस्थित रहे।
मीडिया को संबोधित करते हुए विधायक बिहारीलाल बिश्नोई ने कहा 1975 में कांग्रेस द्वारा आपातकाल लागू किया गया जिसमें प्रेस पर रोक लगाई, लोगों को जेलों में डाल दिया मुल अधिकारों पर रोक लगाई आमजन पर बहुत ज्यादती की  कांग्रेस ने आपातकाल लगाने कारण यह निम्न थे भ्रष्टाचार के विषय पर दिसम्बर 1973 में गुजरात में इंजिनियरिंग कॉलेज से आन्दोलन शुरू हुआ जो
गुजरात से बढ़ते हुए बिहार पहूँचा। बिहार के छात्रों की ओर से शुरू हुआ जेपी आंदोलन 5 जून 1974 के दिन

पटना के गांधी मैदान में संपूर्ण क्रांति में परिवर्तित हो गया। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आव्हान किया था। जयप्रकाश नारायण की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर
निकल पड़ता था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी, काँग्रेस इससे डर गयी थी। इधर राजनारायण जी ने इंदिरा जी के संसदीय चुनाव के विरुद्ध एक चुनाव याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल करवाई थी कांग्रेस की बोलती बंद हो गयी एवं 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायाधीश जगमोहन सिन्हा ने श्रीमती इंदिरा गाँधी का लोकसभा चुनाव निरस्त कर उन्हें 6 साल तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबन्ध लगा दिया। श्रीमती इंदिरा गाँधी ने इस्तीफा देने से इंकार करते हुए हाईकोर्ट के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद जे पी आंदोलन और तेज हो गया। जैसे जैसे
जे पी आंदोलन बढ़ रहा था, वैसे वैसे इंदिरा गाँधी जी के मन में एक अजीब सा भय पैदा हो गया था। देश के हालात जिस तरह के हो गए थे उससे उन्हें लगने लगा था कि उनकी सरकार जल्द ही पलट जाएगी। इधर सुप्रीम कोर्ट के न्यायामूर्ति जस्टिस कृष्णा अय्यर ने 24 जून 1975 के अपने अंतरिम आदेश में इंदिरा गाँधी को
प्रधानमंत्री बने रहने से राहत नहीं दी। कोर्ट के इस फैसले से इंदिरा जी व संजय गांधी जी की स्थिति तो ऐसी बन गई कि काटो तो खून नहीं। ऐसी स्थिति में हाईकोर्ट के फैसले से देश में सन्नाटा छा गया और कांग्रेस के अंदर ही अनेकों सांसद उनके इस्तीफे की मांग करने लगे। कांग्रेस के अंदर भी अनेक सांसद ऐसे थे जिन्होंने कहा कि इंदिरा जी को इस्तीफा दे देना चाहिए। इनमें श्री चंद्रशेखर व रामधन को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। 25 जून 1975 को जय प्रकाश नारायण जी ने रामलीला मैदान में एक विशाल जनसभा की। इस सभा में सेना और आर्मी को किसी का गलत हुक्म न मानने की नसीहत दी गई। इसी सभा के मंच से
जे पी नारायण जी ने सरकारी आतंक के खिलाफ जन जागरण के लिए ‘लोक संघर्ष समिति’ बनाई। इस समिति का चेयरमैन मोरारजी देसाई, महामन्त्री नानाजी देशमुख और कोषाध्यक्ष अशोक जी मेहता को बनाया गया। इस समिति के गठन के बाद श्रीमती इंदिरा गाँधी को अपनी सत्ता का जाना सुनिश्चित हो गया। इंदिरा जी ने कुर्सी पर बने रहने के लिए आपातकाल लगाने का अनैतिक निर्णय लिया, ताकि उनके पास मीडिया पर सेंसर लगाने और बिना चुनाव कराए सत्ता में रहने और मीसा-डीआईआर के तहत विरोधियों को गिरफ्तार करने जैसी असीमित शक्तियां बनी रहे। आपातकाल के दौरान बहुत यातनाएं दी गईं जिसके तहत 26 जून 1975 को जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई समेत बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर जेल में ठूस
दिया गया। जेल में दिल को दहला देने वाली यातनाएं दी गई इन यातनाओं के दौरान जयप्रकाश जी की किडनी तक खराब हो गई। जनसंघ एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। स्व. अटल बिहारी जी वाजपेयी, आदरणीय श्री लालकृष्ण जी आडवानी सहित कई कार्यकर्ताओं को बिना कारण के जेल में
डाल दिया गया। सत्यपाल जैन, पूर्व सांसद, एडीशनल सॉलिसीटर जनरल एवं विधि आयोग के सदस्य को भी 13 जुलाई 1975 को लॉ में प्रवेश देने के बजाय जेल में डाल दिया गया जैसे ही वे इन्टरव्यू देकर कमरे से बाहर आए उनको गिरफ्तार कर लिया गया।

कन्नौज में अहिंसात्मक आंदोलन करने वाले लोकतंत्र सैनानियों का साथ दे रहे शंभुदयाल जी को भी
जेल में डाल दिया गया। शंभूदयाल जी ने बताया कि आनन्द मार्गी सन्यासी मनोज कुमार के साथ तो पुलिस ने
पश्विक कृत्य किया। पहले उन्हें लाठी-डंडो, लात घूसो से पीटा बाद में उनके पैरो के नाखून तक प्लास से खींचे गए प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लगा दी गई. सभी बड़े अखबारों की बिजली काट दी गई जो भी पत्रकार सरकार की बिना ईजाजत के लिखता-बोलता उसे जेल में डाल दिया जाता।
आपातकाल में इन्दिरा जी ने ईआईआर के तहत देशभर में 1 लाख 11 हजार लोगों को जेल में ठूस जिलाध्यक्ष ताराचंद सारस्वत ने प्रेस को सम्बोधित करते हुए कहा कि इन्दिरा जी के इशारों पर संजय गांधी ने आपातकाल के दौरान देशभर में 83 लाख पुरूषों की जबरन नसबंदी करवा दी। दिया। लेखक-कवि और फिल्मकारों को भी आपातकाल के दौरान निशाने पर लिया गया : गायक किशोर कुमार ने सरकार की प्रशंसा में गीत गाने से इंकार कर दिया, उसके विरोध में सरकार ने उनके रेडियो पर उनकी प्रस्तुति को प्रतिबंधित कर दिया गया तथा उनके घर पर आयकर विभाग का छापा डलवा
दिया। किस्सा कुर्सी का फिल्म को सरकार विरोधी मानकर उसकी प्रिंट जला दी गई। गायक एवं लेखक गुलजार की फिल्म “आंधी’ को भी प्रतिबंधित कर दिया गया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के हजारों कार्यकर्ताओं को पुलिस ने बल प्रयोग कर जेल में केद कर लिया साथ ही संघ को प्रतिबंधित कर दिया, मजबूरन हजारों स्वयंसेवकों ने प्रतिबंध के खिलाफ एवं मौलिक अधिकारों के हनन के
खिलाफ सत्याग्रह में भाग लिया। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एवं भारतीय जन संघ के कार्यालयों को जला दिया
गया, सामान लूट लिया गया। प्रमुख कार्यकर्ताओं, संघ संचालक कार्यवाहों (अध्यक्ष एवं सचिव) के घरों को भी
नुकसान पहुंचाया गया। इतना ही नहीं पकड़े गए नेताओं एवं सत्याग्रहियों पर तरह तरह के अत्याचार किए गए।
यदि देशभर में आपातकाल के दौरान कांग्रेस प्रशासन की दमनकारी घटना का आंकलन किया जाए तो बड़े-बड़े
विशालकाय ग्रंथों की कतारे लग जावेगी, जिनके कुछ मुख्य उदाहरण निम्न है :-
जोधपुर के संघ व भारतीय जनसंघ के प्रमुख कार्यकर्ता श्री राजेन्द्र गहलोत को एस.पी. सहित डी.वाई.एस.पी. एवं.
सर्किल इंसपेक्टर ने इतनी बुरी तरह मारा कि लगभग बेहोशी हालत में जेल में लाया गया जहाँ लम्बे समय
चिकित्सा के बाद वे ठीक हो पाये थे।
ऐसा ही एक पाली के कार्यकर्ता ज्ञानदास वैष्णव की भी पाली कोतवाली में पिटाई हुई जिसमें उसकी सुनने की
शक्ति समाप्त हो गई। उसे व उसके साथियों को बिजली का करंट भी दिया गया था।
उदयपुर में 15 अगस्त स्वतंत्रता दिवस समारोह के अवसर पर मेडिकल कॉलेज के तृतीय वर्ष के छात्र भरत सहित
सात-आठ कार्यकर्ताओं ने पर्चे बांटकर नारे लगाते हुए सत्याग्रह किया। उसे स्टेडियम से पीटते हुए कोतवाली ले
गये। वहाँ भी उसे खूब पीटा गया और बार-बार पूछा गया कि बता तेरा नेता कौन है? परन्तु क्या मजाल की
छात्र के मुंह से कुछ उगलवा ले।
बीकानेर में 15 अगस्त को किशोर छात्रों ने सत्याग्रह किया। आपातकाल के विरोध में नारे लगाये व भारतमाता की
जय बोली गई। उन्हें गिरफ्तार कर थाने में लाये। थाने में थप्पडों, लातों व घूसों से खूब मारा गया, बिजली के
करन्ट के झटके भी दिये गये। अवयस्क बालकों पर भी पुलिस अधिकारियों को रहम नही अया।
राजस्थान प्रान्त में मीसा एवं डी.आई.आर. में कुल 849 व्यक्ति पकड़े थे। जिनमें सर्वाधिक 596 व्यक्ति राष्ट्रीय
स्वयंसेवक संघ परिवार के तथा 253 व्यक्ति अन्य दलों के थे। इसी प्रकार सत्याग्रह कर गिरफ्तारी देने वालों की
राजस्थान प्रान्त की कुल संख्या 1682 थी। इनमें भी सर्वाधिक संघ परिवार के 1592 कार्यकर्ता थे। अन्य दलों के
सत्याग्रहियों की संख्या 90 थी। इस सत्याग्रह में प्रान्त के सभी 26 जिलों के 89 स्थानों पर 249 जत्थों में 257
ग्राम व शहरों के कार्यकर्ता थे। राजस्थान की तरह देश के सभी प्रांतों में ये सत्याग्रह हुए तथा यह समझना भी
सहज है कि इनमें राजस्थान की तरह सर्वाधिक भूमिका संघ परिवार की ही थी।
सर्वोदयी नेता विनोबा भावे ने आपातकाल को “अनुशासन पर्व’ की संझा दी वही सर्वोदयी नेता लोकनायक
जयप्रकाश नारायण ने आपातकाल को “भारतीय इतिहास की सर्वाधिक काली अवधि’ कहा।
1975 के आपातकाल में उत्तरप्रदेश के हजारों लोगों ने कुर्वानी दी। जुल्म के शिकार अनेक कार्यकर्ता इस दुनिया
में नहीं है। हजारों स्वयंसेवकों ने आपातकाल हटाने के लिए सत्याग्रह कर गिरफ्तारियां दी। पुरूषोत्तम
खण्डेलवाल के नेतृत्व में बेलनगंज के कई स्वयं सेवकों और कार्यकर्ताओ ने गिरफ्तारी दी। जनसंघ के वरिष्ठ नेता
राजकुमार सामा, हरद्वार दुबे, संघ के अधिकारी रसिक बिहारी लाल गुप्ता, भगवान शंकर रावत आदि अनेक
कार्यकर्ता मीसा में बंदी बनाए गए। सरस्वती विद्या इन्टर कॉलेज, उत्तर विजय नगर कॉलोनी के प्रधानाचार्य के
जेल के दौरान उनके एकमात्र पुत्र की मृत्यु हो गयी, पर उन्हें रिहा नहीं किया गया। उनकी पुत्री की शादी में
कन्यादान के लिए उन्हें मात्र दो घंटे की पैरोल पर छोड़ा गया। आगरा में सबसे कम उम्र 13 वर्ष के स्वयं सेवक
संजय गोयल पुत्र सत्यनारायण गोयल ने गिरफ्तारी दी और कई महीनों तक कारागार में रहे।
आपातकाल में लोकतंत्र की हत्या हुई, सत्त लोलुप्त इंदिरा गांधी ने अखबारों पर सेंसरशिप लगाई. राजनैतिक कार्यालयों पर छापे मारे गये।
इस प्रकार 19 महीनों तक आपातकाल का संघर्ष चला।

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