अब विवाह नहीं सौदे होने लगे हैं!

शिव दयाल मिश्रा
भारतीय संस्कृति में 16 संस्कारों में से एक संस्कार विवाह संस्कार भी है जो हमारे समाज और परिवार को बांधकर रखता है। अगर विवाह नहीं होंगे तो न परिवार होगा और न ही समाज। आज समाज और परिवार दोनों ही दांव पर लगे हैं। समाज इसलिए दांव पर लगा है कि वह मूक दर्शक बनकर रह गया है या यूं समझो कि समाज को कोई मानता ही नहीं है यानि अस्तित्व ही संकट में है तो दूसरी तरफ परिवार भी सिमटता जा रहा है। हम, तुम और ये। हम तुम से मतलब पति-पत्नी तथा ये से मतलब बच्चा। बच्चा एक या दो। उससे ज्यादा आज परिवार के नाम पर कुछ ही शेष रह गया है। समाज खत्म इसलिए हो रहे हैं कि उनकी कोई अहमियत ही नहीं रही, समाज की कोई सुनता नहीं है। और परिवार इसलिए खत्म हो रहे हैं कि परिवार में समय पर विवाह नहीं हो रहे हैं। आजकल निर्धारित उम्र से भी बहुत देर तक नौकरी और केरियर बनाने के चक्कर में लडक़े-लड़कियों के विवाह नहीं होते। फिर वे अपनी मां-बाप की मर्जी के दूल्हे-दुल्हन से शादी नहीं करते। अपनी मर्जी से करना चाहते हैं। जब विवाह समय पर नहीं होंगे तो पति-पत्नी में एक दूसरे के प्रति सद्भाव और प्रेम पनप ही नहीं पाएगा। वे लोग एक-दूसरे के स्वभाव में ढल नहीं पाते। ढल नहीं पाते तो लड़ाई-झगड़े और फिर विवाह विच्छेद या दूर होते जाना। इस सबके अतिरिक्त और भी कई वजह है जिनके कारण अब वैवाहिक रिश्तों में प्रेम नहीं रहा। अब विवाह नहीं सौदेबाजी होते हैं। पहली बात एक उम्र के बाद मां-बाप अपनी मर्जी से बच्चों की शादी नहीं कर पाते। पहले खानदान देखते थे समाज में परिवार की प्रतिष्ठा देखी जाती थी, फिर बच्चों के संस्कारों को देखा-परखा जाता था। अब ये सारी बातें गौण हो गई है। अब तन की सुन्दरता, नौकरी, बिजनेस, धन दौलत, कार-बंगला देखा जाता है। अब साइकिल स्कूटर वाला परिवार नहीं, सब कार वाले लडक़े को पसंद करते हैं। अधिकांश तो दहेज में लडक़ी वाले से कार मांगने लगे हैं। लडक़े वाले दहेज के लालच में बड़े घरों की लडक़ी पसंद करने लगे हैं, दूसरी तरफ लडक़ी वाले भी पैसे वालों से रिश्ता करना चाहते हैं ताकि लडक़ी को घर का काम नहीं करना पड़े। सब नौकर-चाकर करें। लडक़ी वालों को छोटा परिवार चाहिए। छोटे परिवार के चक्कर में आजकल परिवार कुछ ज्यादा ही छोटा हो गया है। पहले के समय में जब लडक़ा देखने के लिए जाते थे तो लडकी क्या-क्या काम जानती है उसको गिनाते थे। आजकल तो साफ ही कह देते हैं कि हमारी लडक़ी ने घर में काम नहीं किया है। हमने बच्ची से घर का काम नहीं कराया है। ऐसा कहना लडक़ी वाले अपनी शान समझते हैं। पहले कहा जाता था कि खांदा (गांवों में मिट्टी खोदने की जगह) मिट्टी और जाति की बेटी में कोई बुराई नहीं है। यानि की पवित्र मानी जाती है। अब ये सब बातें पीछे छूट गई है। गौण हो गई है। जिस तरह गाडिय़ों का बाजार सजा रहता है उस तरह आजकल रिश्तों का भी बाजार सजने लगा है। अब तो रिश्तों की नहीं बेहतरी की तलाश रहती है। विवाह के लिए रिश्ता ढूंढऩे के नाम पर अजीब सा तमाशा होने लगा है। उस तलाश को करते-करते विवाह की उम्र ही निकल जाती है। अच्छे की तलाश में सब अधेड़ हो रहे हैं। फिर इसके बाद सौ कोड़े और सौ प्याज खाने जैसी हालत हो जाती है। या तो अविवाहित रहना पड़ता है या फिर अनचाहा रिश्ता करना पड़ता है। ऐसी मानसिकता जब बन जाती है तो इनको कौन समझाए कि एक उम्र में जो चेहरे पर चमक और एक दूसरे परिवार को समझने और समर्पित होने का जो भाव होता है वह अधेड़ उम्र में नहीं रहता। चाहे ब्यूटीपार्लर में जाकर लाख रंगरोगन करवा लो। एक और संक्रमण फैल रहा है लडक़ी या लडक़ा सरकारी नौकरी में है तो उसे अपना जीवन साथी भी सरकारी नौकरी वाला ही चाहिए। अब ये कैसे संभव हो, मगर मां-बाप अपने किए का खुद भरता है। ढूंढ़ता रह… ढूंढ़ता रह। पहले पूछा जाता था कि लडक़ा क्या करता ैहै? लडक़ी को रोटी और कपड़े की कमी तो नहीं रहेगी। अब लडक़े वाला पूछता है लडक़ी क्या करती है? हो गई उल्टी व्यवस्था। कहीं-कहीं शादी के बाद लडक़ी को भी आजकल प्राइवेट ही सही, मगर नौकरी करनी पड़ जाती है। दोनों नौकरी करेंगे। चाहे भोजन बाजार से ही मंगाना पड़े। एकल परिवार के कारण बच्चों को आया के भरोसे या बोर्डिंग में छोडऩा पड़े। फिर महिलाएं लोभ के वशीभूत चाहकर भी नौकरी नहीं छोड़ पाती। ऐसे में पति-पत्नी में से किसी पर भी एक-दूसरे का अधिकार नहीं रहता। सहनशीलता, इज्जत और समर्पण की बात तो दूर की कौड़ी हो जाती है। चिक-चिक चालू। ये सब परिस्थितियां आगे चलकर तनाव पैदा करती है और आत्महत्या या तलाक का कारण बनती हैं। घर परिवार झुकने से चलता है अकडऩे से नहीं। जीवन में जीने के लिए दो रोटी और छोटे से घर की जरूरत होती है। इसके अलावा आपसी तालमेल और प्रेम प्यार। मगर आजकल बड़ा घर और बड़ी गाड़ी जरूरत बना ली गई है। आजकल घर में सारी सुविधाएं उपलब्ध होती हैं जैसे कपड़़े धोने के लिए वाशिंग मशीन, मसाला पीसने के लिए मिक्सी, पानी भरने के लिए मोटर, मनोरंजन के लिए टीवी, बात करने के लिए मोबाइल। फिर भी संतुष्टी नहीं। पहले इनमें से कोई सुविधा उपलब्ध नहीं थी। पूरा मनोरंजन घर परिवार का काम था, जिसे हंसते गाते कर लिया करते थे। फालतू की बातें दिमाग में आती ही नहीं थी। अब सारी बातें टीवी सिखा देता है। छल, कपट, झूठ, पाखंड। भुगते पूरा परिवार। दिन में घंटों तक मोबाइल पर बातें, घंटों तक सीरियल देखना, ब्यूटी पार्लर में समय बिताना। फिर कोई बात आए तो सुनने को मिलता है कि काम से फुर्सत ही नहीं। हंसी आती है। परिवार में खुशी से रहो। बेटी आज बहू बनी है तो कल सासू भी बनेगी। इसलिए सहनशीलता और परिवार में सभी छोटे-बड़ों का सम्मान करना चाहिए। ये सब लौटकर मिलता है। जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आते हैं। बड़ों की राय लेकर आगे बढ़ते चलना चाहिए और अपनी पुरानी परंपराओं को यानि जड़ को नहीं छोडऩा चाहिए। विवाह समय पर होने चाहिए सौदे नहीं।

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