आत्मनिर्भर भारत की पहली जंग में फुस्स हुए चीनी हथियार, चर्चित अमेरिकी एक्सपर्ट ने बताया ‘मेक इन इंडिया’ की जीत, भारत अब एक संप्रभु राष्ट्र

जॉन स्पेंसर ने लिखा है कि कोविड संकट के समय चीन के साथ गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत के आत्मनिर्भर हथियार बनाने की दिशा में दूसरी लहर आई। मोदी सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ को एक सिद्धांत की तरह पेस किया। अब पूरी दुनिया को स्पष्ट शब्दों में संदेश चला गया है कि आत्मनिर्भर हथियारों के मामले में अब भारत एक शक्ति बन चुका है।


नई दिल्ली: ऑपरेशन सिंदूर के बाद आम भारतीयों के बीच सबसे ज्यादा चर्चा भारतीय हथियारों को लेकर है। कई लोग ये भी पूछ रहे हैं कि आखिर भारत अब तक लड़ाकू विमानों का इंजन क्यों नहीं बना पाया। इन सवालों के पीछे कई फैक्टर्स हैं, लेकिन सबसे बड़ा फैक्टर राजनीतिक इच्छाशक्ति का है। 2014 के बाद भारतीय डिफेंस इंडस्ट्री में असली परिवर्तन का काम शुरू हुआ, जब मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ की बुनियाद पर स्वदेशी हथियारों को बनाने का लक्ष्य रखा। इसका मकसद था विदेशी हथियारों पर भारत की निर्भरता कम करते हुए भारत की डिफेंस इंडस्ट्री को ग्लोबल बनाना। पहलगाम आतंकी हमले के बाद जब भारत ने ऑपरेशन सिंदूर चलाया और जब पाकिस्तान ने आतंकियों का साथ देते हुए भारत पर हमले शुरू किए तो फिर ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की असली परीक्षा शुरू हुई।

अमेरिका के वॉर इंस्टीट्यूट में ‘शहरी लड़ाई’ पढ़ाने वाले पूर्व अमेरिकी डिफेंस एक्सपर्ट जॉन स्पेंसर ने भारत और पाकिस्तान के बीच हुए इस संघर्ष को लेकर अपना एनालिसिस रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री मोदी का ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ मुहिन पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध के मैदान में असली विजेता साबित हुआ है। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि भारत ने ना सिर्फ ये परीक्षा पास की है, बल्कि दुश्मनों और दुनिया को दिखा दिया कि भारत अब वो देश है, जो अपनी लड़ाई खुद के हथियारों से, खुद के आकाश में, और खुद की शर्तों पर लड़ता है। मोदी सरकार ने 2014 के बाद रक्षा क्षेत्र में FDI के दरवाजे को 74% तक खोला दिया, पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप को बढ़ावा दिया और कई एडवांस सिस्टम, जैसे ब्रह्मोस, K9 वज्र, और AK-203 जैसे तेजी से चलने वाले हथियार स्वदेशी उत्पादन में बनाने शुरू किए।

युद्ध के मैदान में पास हुए भारतीय हथियार
जॉन स्पेंसर ने लिखा है कि कोविड संकट के समय चीन के साथ गलवान घाटी संघर्ष के बाद भारत के आत्मनिर्भर हथियार बनाने की दिशा में दूसरी लहर आई। मोदी सरकार ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ को एक सिद्धांत की तरह पेस किया। हालांकि सेना को आपातकालीन हथियारों की खरीददारी की इजाजत तो दी गई, लेकिन स्वदेशी रिसर्च एंड डेवलपमेंट, डिजाइन और प्रोडक्शन में निवेश को बढ़ाना शुरू किया। साल 2025 तक भारत ने रक्षा खरीद में घरेलू सामग्री को 30% से बढ़ाकर 65% कर दिया, जिसका लक्ष्य दशक के अंत तक 90% करना है। आत्मनिर्भर भारत की क्षमता की परीक्षा 22 अप्रैल को पहलगाम आतंकी हमले के बाद शुरू हुआ। जिसके बाद भारत ने पाकिस्तानी आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर लॉन्च किया। भारत ने आतंकियों के खिलाफ लड़ाई में जिस तरह से हथियारों का इस्तेमाल किया और भारतीय हथियारों ने जितनी सटीकता के साथ हमले किए, उसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। भारत के स्वदेशी हथियारों ने दुनिया के मंच पर खुद को साबित कर दिया। मतलब सोचिए कि भारत ने ड्रोन से पाकिस्तान के चीनी एयर डिफेंस सिस्टम को मार गिराया, ये किसी करिश्मे से कम नहीं है।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने अपने स्वदेशी हथियारों का अभूतपूर्व तरीके से इस्तेमाल किया। भारत के ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलों ने दुश्मन के बंकर, रडार स्टेशन और करीब दर्जनभर एयरबेस ध्वस्त कर दिए, जबकि ‘अकाश-आकाशतीर’ सिस्टम ने पाकिस्तान की चीनी-निर्मित मिसाइलों और ड्रोन को हवा में ही खत्म कर दिया। इसरो की सैटेलाइट ने भारतीय वायुसेना को पाकिस्तानी टारगेट्स पर सटीक हमले करने की क्षमता दी और फिर भारत ने रूसी एयर डिफेंस सिस्टम एस-400 से पाकिस्तान के AWACS एयरक्राफ्ट को हवा में मारकर उसकी सर्विलांस की क्षमता पर गहरा असर डाला। फिर भारत ने भोलारी एयरबेस पर मौजूद दूसरे AWACS एयरक्राफ्ट को भी मारकर पाकिस्तान वायुसेना की 70 प्रतिशत सर्विलांस क्षमता को खत्म कर दिया।

पाकिस्तान के कौन कौन चीनी हथियार हुए फेल
JF-17 Thunder (Block II/III)- JF-17 लड़ाकू विमान भले ही पाकिस्तान में बना हो, लेकिन इसे बनाया पूरी तरह से चीन ने ही है। जेएफ-17 में चीनी एवियोनिक्स, रडार, इंजन (आरडी-93) और फायर करने वाले हथियार हैं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना की मिसाइलों और एयर डिफेंस का मुकाबला करने में नाराम रहे। इन विमानों की सीमित पेलोड, पुराना रडार और खराब उत्तरजीविता भारतीय वायुसेना के सामने काफी कमजोर निकले। जिसका नतीजा ये निकला की 7 मई की रात के बाद पाकिस्तान वायुसेना ने अपने एक भी लड़ाकू विमानों को लड़ने के लिए नहीं भेजा। भारत ने जब भोलारी बेस पर मिसाइल हमला किया तो उसमें दो जेएफ-17 फाइटर जेट तबाह हो गये। अमेरिका के दो एफ-16 फाइटर जेट के भी तबाह होने की रिपोर्ट है।

HQ-9 / HQ-16 SAM सिस्टम- रूस के S-300 और Buk सिस्टम को कॉपी करने चीन ने HQ-9 और HQ-16 एयर डिफेंस सिस्टम बनाया है। इन्हें भारतीय हवाई और मिसाइल हमलों को रोकने के लिए तैनात किया गया था। लेकिन वे भारत के जैमिंग और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के सामने बुरी तरह से नाकाम रहे। भारत ने लाहौर रडार सिस्टम को अपने ड्रोन से उड़ा दिया। भारत की मिसाइलों को रोकने में ये चीनी एयर डिफेंस बुरी तरह से नाकाम रहे।


LY-80 और FM-90 एयर डिफेंस:
पुराने शॉर्ट और मीडियम-रेंज वाले सरफेस टू एयर मिसाइल सिस्टम। ये भी चीन में बने हैं। दोनों ही भारत के कम उड़ान वाले ड्रोन और सटीक हथियारों का पता लगाने या उन्हें रोकने में नाकाम थे। इसकी वजह से पाकिस्तान के पास भारतीय मिसाइलों के खिलाफ प्रतिक्रिया देने की क्षमता ही खत्म हो गई थी।

CH-4 ड्रोन: पाकिस्तान ने भारी संख्या में चीन से CH-4 ड्रोन खरीद रखे हैं, जिन्हें उसने भारत के खिलाफ तुर्की के ड्रोन के साथ मिक्स कर इस्तेमाल किया था। लेकिन एक भी ड्रोन भारत के खिलाफ कामयाब नहीं हो पाया। ज्यादातर ड्रोन या तो जाम कर दिए गये और बचे हुए ड्रोन को मार गिराया गया। चीन के ड्रोन, भारत के D4S सिस्टम के वर्चस्व वाले इलाके और इलेक्ट्रॉनिक वातावरण में कीट पतंगों की तरह गिर कर भस्म हो गये।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पूरी दुनिया को साफ और स्पष्ट शब्दों में संदेश चला गया है कि आत्मनिर्भर हथियारों के मामले में अब भारत अब एक संप्रभु राष्ट्र बन चुका है, जो खुद के बनाए हथियारों से लड़ता है और जीतता है। पाकिस्तान की हार सिर्फ एक सैन्य पराजय नहीं है, बल्कि यह उस रणनीतिक झूठ की हार थी जिसमें वह चीनी हार्डवेयर के दम पर ताकतवर बनने का भ्रम पाल रहा था। हालांकि भारत को अभी भी लड़ाकू विमानों के निर्माण पर काम करना होगा और लग यही रहा है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय डिफेंस सेक्टर में आत्मनिर्भरता का तीसरी लहर शुरू हो गई है और अगले 10 सालों में भारत के स्वदेशी हथियारों के सामने बड़ी बड़ी शक्तियों का ठहरना मुश्किल हो जाएगा।

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