चीन, अमेरिका, रूस… संयुक्‍त राष्‍ट्र में गरजीं भारत की बेटी, सुरक्षा परिषद के स्‍थायी सदस्‍यों को लगाई फटकार

UNSC Reforms India: संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के स्‍थायी सदस्‍यों को भारत ने जमकर फटकार लगाई है। भारत ने कई दशक से संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग कर रहा है लेकिन पश्चिमी देश और चीन इस मांग को दरकिनार कर रहे हैं। भारत की संयुक्‍त राष्‍ट्र में राजदूत रुचिरा कंबोज ने इन देशों को जमकर सुनाया है।

वॉशिंगटन: भारत समेत दुनिया के कई देशों की लंबी समय से चल रही मांग के बाद भी संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद के सुधारों पर कोई भी कार्रवाई आगे नहीं बढ़ पा रही है। दूसरे विश्‍वयुद्ध के बाद बने संयुक्‍त राष्‍ट्र में अब भी 5 स्‍थायी सदस्‍यों अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन का ही दबदबा बना हुआ है। इतने साल बीत जाने के बाद दुनिया में भारत, जर्मनी, जापान जैसी कई नई ताकतें उभरकर आई हैं और फ्रांस तथा ब्रिटेन जैसे स्‍थायी देशों का पतन हुआ है। इन बदली हुई परिस्थितियों के बाद भी भारत की मांग को दशकों से अनसुना किया जा रहा है। एक बार फिर से भारत ने संयुक्‍त राष्‍ट्र के मंच से ही सभी 5 स्‍थायी देशों को जमकर फटकार लगाई है। भारत ने कहा कि 5 स्‍थायी देश कब तक 188 देशों की सामूहिक इच्‍छा की अवहेलना करते रहेंगे।

संयुक्‍त राष्‍ट्र में भारतीय राजदूत रुचिरा कंबोज ने संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की मांग करते हुए अपने एक बयान में कहा कि कितने लंबे समय तक 5 सदस्‍य देशों की इच्‍छा 188 देशों की सामूहिक इच्‍छा की अवहेलना करती रहेगी। इसे निश्चित रूप से बदलना होगा। भारत ने कहा कि सभी देशों को संयुक्‍त राष्‍ट्र में समान अवसर मिलना चाहिए। उन्‍होंने कहा कि ग्‍लोबल साउथ के देशों के साथ ऐतिहासिक रूप से अन्‍याय किया गया है और इसे तत्‍काल सही करने की जरूरत है। उन्‍होंने कहा कि संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार करके स्‍थायी और अस्‍थायी सदस्‍यों की संख्‍या बढ़ाई जाए और उसमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों को शामिल किया जाए।

संयुक्‍त राष्‍ट्र में सुधारों का विरोध कर रहा है चीन
कंबोज ने कहा कि कमजोर देशों को समान मौका दिया जाना चाहिए ताकि जो भी निर्णय लिए जाएं वे सबके हित में हो सकें। उन्‍होंने कहा क‍ि इन सुधारों को समानता को बढ़ावा देने के लिए होना चाहिए। उन्‍होंने कहा, ‘भारत संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद में व्‍यापक सुधार का समर्थन करता है। इसमें स्‍थायी और गैर स्‍थायी सदस्‍यों की संख्‍या शामिल है।’ उन्होंने सुरक्षा परिषद की कार्यप्रणाली में भी सुधार की जरूरत पर बल दिया ताकि किसी भी देश के साथ भेदभाव नहीं हो। बता दें कि भारत की स्‍थायी सदस्‍यता की दावेदारी का चीन सबसे कड़ा विरोध कर रहा है।

चीन चाहता है कि वह एशिया में अकेला ऐसा देश रहे जो सुरक्षा परिषद का स्‍थायी सदस्‍य हो। इसी वजह से चीन लगातार भारत के प्रयासों को खुद भी और पाकिस्‍तान समेत अन्‍य देशों के जरिए रोक रहा है। दरअसल, संयुक्‍त राष्‍ट्र की स्थापना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद वैश्विक शांति और स्थिरता बनाए रखने के उद्देश्य से की गई थी। सुरक्षा परिषद के 15 सदस्यों से पांच स्थायी सदस्य और 10 अस्थायी सदस्य होते हैं। स्थायी सदस्यों अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और रूस के पास वीटो शक्ति है और वे किसी प्रस्‍ताव को आसानी से रोक देते हैं। इन देशों का संयुक्त राष्ट्र के कामकाज पर व्‍यापक प्रभाव है। भारत और कई अन्य देशों ने साफ कह दिया है कि प्रासंगिक बने रहने के लिए यूएनएससी को सुधारों से गुजरना होगा।

भारत की राह को पाकिस्‍तान भी रोक रहा
विशेषज्ञों के मुताबिक संयुक्‍त राष्‍ट्र सुरक्षा परिषद की वर्तमान संरचना में कई समस्याएं हैं। सबसे पहले, यह 70 साल पहले स्थापित किया गया था और 1965 से इसका विस्तार नहीं किया गया है। इससे वर्तमान समय में इसके प्रतिनिधित्व को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं। एक और मुद्दा स्थायी सदस्यों के बीच शक्ति का असमान वितरण है, जिनमें से अधिकांश पश्चिमी दुनिया से हैं। लैटिन अमेरिकी, अफ्रीकी और पश्चिम एशियाई शक्तियों से प्रतिनिधित्व की यह कमी एक महत्वपूर्ण कमी के रूप में देखी जाती है। वास्तव में, साल 2013 में, सऊदी अरब ने संस्थागत सुधार के अभाव के कारण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अस्थायी सदस्यता लेने से इनकार कर दिया था।

भारत सक्रिय रूप से यूएनएससी के भीतर सुधार के लिए जोर दे रहा है। भारत G4 समूह का हिस्सा है, जिसमें जर्मनी, जापान और ब्राजील भी शामिल हैं। इन चार देशों ने यूएनएससी के विस्तार को बढ़ावा देने और स्थायी सीटों के लिए एक-दूसरे की आकांक्षाओं का समर्थन करने के लिए एक गठबंधन बनाया है। वहीं जी 4 को रोकने के लिए चीन के इशारे पर पाकिस्‍तान ने अपना एक अलग गुट बनाया है और सुधारों का विरोध कर रहा है। इस बीच विशेषज्ञ यूएनएससी के भीतर महत्वपूर्ण सुधार की संभावना के बारे में संशय में हैं। मौजूदा व्यवस्था में महत्वपूर्ण विशेषाधिकारों का फायदा लेने वाली दुनिया की प्रमुख शक्तियां किसी भी बड़े बदलाव का विरोध कर रही हैं।

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