भारत में 50 साल पहले कैसे शामिल हुआ सिक्किम? क्यों पड़ी थी आर्मी की जरूरत?

सिक्किम का भारत में विलय 1975 में जनमत संग्रह, राजनीतिक अस्थिरता और सामरिक जरूरतों के चलते हुआ। चोग्याल के विरोध के बीच सेना और रॉ की अहम भूमिका रही। यह भारत की सुरक्षा और लोकतंत्र की दिशा में बड़ा कदम था।

हिमालय की गोद में बसा भारत का एक खूबसूरत और छोटा सा राज्य सिक्किम आज से 50 साल पहले भारतीय गणराज्य का 22वां राज्य बना। लेकिन 16 मई 1975 को हुआ यह विलय इतना आसान नहीं था। इसमें राजनीति, कूटनीति और सैन्य बल की अहम भूमिका रही। सिक्किम का भारत में शामिल होना एक लंबी और जटिल प्रक्रिया थी, जिसमें सामरिक रणनीति, जनता की मांग, और अंतरराष्ट्रीय दबाव शामिल थे। आइए, आज समझते हैं कि सिक्किम की कहानी है क्या?


सिक्किम का इतिहास बहुत पुराना है। 8वीं सदी में बौद्ध भिक्षु गुरु रिन्पोचे ने सिक्किम का दौरा किया और बौद्ध धर्म का प्रचार किया। 1642 में फुंत्सोंग नामग्याल को सिक्किम का पहला चोग्याल (राजा) बनाया गया, जिसके साथ नामग्याल राजवंश की शुरुआत हुई। यह राजवंश 333 साल तक सिक्किम पर शासन करता रहा। 19वीं सदी में ब्रिटिश शासन के दौरान सिक्किम एक बफर स्टेट के रूप में कार्य करता था, जो ब्रिटिश भारत और चीन के बीच एक रणनीतिक क्षेत्र था। 1861 की तुम्लोंग संधि के तहत सिक्किम पर ब्रिटिश नियंत्रण बढ़ गया, लेकिन चोग्याल का शासन बना रहा।

1947 में जब भारत आजाद हुआ, सिक्किम ने भारत के साथ विलय को एक जनमत संग्रह में अस्वीकार कर दिया। इसके बाद, भारत और सिक्किम के बीच 1950 में एक संधि हुई, जिसके तहत सिक्किम भारत का संरक्षित राज्य बना। भारत ने सिक्किम की रक्षा, विदेश नीति, और संचार की जिम्मेदारी ली, लेकिन सिक्किम की आंतरिक स्वायत्तता बरकरार रही।

भारत में विलय की प्रक्रिया
सिक्किम का भारत में विलय कई कारणों से जरूरी हो गया था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद भारत ने अपनी उत्तर-पूर्वी सीमाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीरता दिखाई। सिक्किम, जो चीन की चुंबी घाटी और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के पास स्थित है, सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण था। सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे ‘चिकन नेक’ भी कहते हैं, भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। सामरिक विशेषज्ञों का मानना था कि अगर चीन सिक्किम पर कब्जा कर लेता है, तो वह आसानी से सिलीगुड़ी कॉरिडोर को काट सकता है, जिससे भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा अलग-थलग पड़ सकता था।

1973 का विद्रोह: 1973 में सिक्किम में चोग्याल राजवंश के खिलाफ जनता सड़कों पर उतर आई। सिक्किम की 75% आबादी नेपाली मूल की थी, जो राजशाही से असंतुष्ट थी और अधिक लोकतांत्रिक अधिकार चाहती थी। सिक्किम नेशनल कांग्रेस के नेता काजी ल्हेंदुप दोरजी ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया और भारत से सिक्किम को संरक्षण देने की मांग की। इसके बाद भारत ने सिक्किम में अपनी स्थिति मजबूत करनी शुरू की।
1974 का संविधान और जनमत संग्रह: 1974 में सिक्किम में एक नया संविधान लागू किया गया, जिसने चोग्याल की शक्तियों को नाममात्र का कर दिया। उसी साल सिक्किम नेशनल कांग्रेस ने चुनाव जीता। 14 अप्रैल 1975 को सिक्किम में एक ऐतिहासिक जनमत संग्रह हुआ, जिसमें 97.55% मतदाताओं ने भारत में विलय के पक्ष में वोट दिया। कुल 97,000 लोग इस जनमत संग्रह में हिस्सा ले सकते थे। इनमें से 61,133 लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया जिसमें 59,637 वोट भारत में शामिल होने के पक्ष में और केवल 1,496 वोट इसके खिलाफ पड़े।
16 मई 1975: जनमत संग्रह के परिणामों के आधार पर, 23 अप्रैल 1975 को लोकसभा में सिक्किम को भारत का 22वां राज्य बनाने का संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, जिसे 299-11 के मत से पास किया गया। 26 अप्रैल को यह बिल राज्यसभा में पास हुआ, और 15 मई 1975 को राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इस पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही, सिक्किम औपचारिक रूप से 16 मई 1975 को भारत का हिस्सा बन गया, और नामग्याल राजवंश का शासन समाप्त हो गया।

सिक्किम में आर्मी की जरूरत क्यों पड़ी?
सिक्किम के विलय में भारतीय सेना की भूमिका महत्वपूर्ण थी। 6 अप्रैल 1975 को भारतीय सेना ने सिक्किम के राजमहल को घेर लिया और चोग्याल पाल्डेन थोंडुप नामग्याल को नजरबंद कर दिया। राजमहल में तैनात 243 गार्ड्स को तुरंत काबू कर लिया गया। इस सैन्य कार्रवाई की जरूरत इसलिए पड़ी क्योंकि चोग्याल भारत के साथ विलय के खिलाफ थे और उनकी सरकार में अस्थिरता बढ़ रही थी। इसके अलावा, चीन की साम्राज्यवादी नीतियों और सिक्किम के प्रति उसके रुख को देखते हुए भारत को यह सुनिश्चित करना था कि सिक्किम सामरिक रूप से सुरक्षित रहे।

सैन्य कार्रवाई ने यह भी सुनिश्चित किया कि जनमत संग्रह और विलय की प्रक्रिया में कोई हिंसक विरोध न हो। भारत की रॉ (रिसर्च एंड एनालिसिस विंग) ने भी इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्देश पर रॉ के संस्थापक आर.एन. काव ने 4 दिन में सिक्किम के विलय की योजना तैयार की थी।

सिक्किम के राजा और रानी की एक और तस्वीर (1966)।

सिक्किम पर पहले किसका शासन था?
भारत में शामिल होने से पहले सिक्किम पर नामग्याल राजवंश का शासन था, जिसके राजा को चोग्याल कहा जाता था। 1642 में फुंत्सोंग नामग्याल को पहला चोग्याल बनाया गया था। 1975 में विलय के समय चोग्याल पाल्डेन थोंडुप नामग्याल सिक्किम के शासक थे। उनकी अमेरिकी पत्नी होप कुक भी चर्चा में रही थीं, जो चोग्याल की आदतों से परेशान होकर 1975 में अपने बच्चों के साथ अमेरिका लौट गई थीं। चोग्याल का शासन तिब्बती मूल का था और सिक्किम की संस्कृति में बौद्ध धर्म का गहरा प्रभाव था।

अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया कैसी रही?
सिक्किम के भारत में विलय का सबसे ज्यादा विरोध चीन ने किया। चीन ने इसे भारत की साम्राज्यवादी नीति करार दिया और आज भी सिक्किम की सीमा को लेकर भारत-चीन के बीच विवाद बना हुआ है। नेपाल में भी कुछ हद तक विरोध हुआ, क्योंकि सिक्किम की 75% आबादी नेपाली मूल की थी, लेकिन वहां की सरकार ने इसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी। इस तरह देखा जाए तो सिक्किम का भारत में विलय एक ऐतिहासिक और सामरिक रूप से महत्वपूर्ण घटना थी। यह न केवल भारत की सुरक्षा के लिए जरूरी था, बल्कि सिक्किम की जनता की लोकतांत्रिक मांगों का भी परिणाम था।

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