नहीं रहे,पूर्व प्रशासनिक अधिकारी व श्रीकोलायत के पूर्व उपसरपंच श्री उमाराम पंचारिया,कोरोना को मात देकर भी बचा नही पाए जिंदगी

-नारायण उपाध्याय
बीकानेर@जागरूक जनता । जिन्हें लोग बड़े आदर व सम्मान से पटवारी जी के नाम से सम्बोधन करते थे। परिवार व समाज के लिए वे एक आदर्श पुरूष थे,  जिन्होंने ताउम्र ईमानदारी व सच्चाई का पाठ पढ़ाया, उनकी कही हुई बातों में इतना वजन होता था कि श्रीकोलायत व आसपास के गाँवो सहित समाज की पंचायत में उनकी सलाह मशविरा के बिना कोई कार्य नही होता । खैर इतना सब बताने के बाद आपको पता लग गया होगा कि हम किसकी बात कर रहे है यंहा यह कहना भी जरूरी है कि शख्सियत किसी परिचय की मोहताज नही होती, हम बात कर रहें है पूर्व प्रशासनिक अधिकारी एंव श्रीकोलायत के पूर्व उपसरपंच श्री उमाराम पंचारिया की जिनसे एक बार भी कोई मिला वो उनसे बार-बार मुलाकात करने की सोचता, क्योंकि उनकी सादगी और उनके परामर्श जिंदगी से जुड़े कटु सत्य होते थे । लेकिन कहते है ना कि ईश्वर के घर से बुलावा आ जाए तो भला किसका वश चलता है । इस बीच श्री उमाराम जी पंचारिया 26 अप्रेल को कोरोना संक्रमित हो गए । और दो- तीन दिन में ही उनकी तबियत दिनों दिन बिगड़ती चली गई और आखिरकार उन्हें ऑक्सीजन सपोर्ट पर लेना पड़ा । इस बीच 3 मई को उनकी तबियत ज्यादा बिगड़ने पर उनके परिजन उन्हें श्रीकोलायत से बीकानेर के पीबीएम हॉस्पिटल में ले आए इस पर उन्हें कोविड सेंटर के फर्स्ट फ्लोर में सी वार्ड में एडमिट किया गया । जंहा उन्होंने 95 वर्ष की आयु के बावजूद दो दिन में ही कोरोना से जंग जीत ली, और रिपोर्ट भी नेगेटिव आ गई लेकिन इस दौरान लंग्स में इंफेक्शन होने के कारण उनकी तबियत बिगड़ती चली गई । यंहा से शुरू हुई जिंदगी बचाने की मुहिम काल की भेंट चढ़ गई । पीबीएम को अगर मौत का घर कहे तो यह कहना गलत नही होगा क्योंकि पंचारिया जी को मौत के मुंह से बचाने के लिए राजस्थान सरकार के मंत्री से लेकर केंद्रीय मंत्री व जिला कलेक्टर, पीबीएम सुपरिडेंट व तमाम बड़े डॉक्टरों से एक आईसीयू बेड की व्यवस्था करने की गुहार लगाई गई लेकिन सभी ने आईसीयु बेड फूल होने का हवाला देकर यह सांत्वना दी गई कि जैसे ही बेड खाली होगा तो तुरंत पंचारिया जी को दे दिया जाएगा । अब इन से कोई पूछे कि क्या जिंदगी की सांसे किसी का इंतजार करती है इस दरम्यान पंचारिया जी दो दिन आईसीयू बैड की आस में बेहतर इलाज के इंतजार में  आखिरी दम तक जंग लड़ते रहे और इस बीच अस्पताल प्रशासन ने मौत से चंद घण्टे पहले उन्हें आईसीयु में शिफ्ट किया लेकिन लंग्स डेमेज होने के कारण साइलेंट अटैक के चलते उन्होंने आखिरी सांस ली,वे लाचार और बदहाल चिकित्सा व्यवस्था की भेंट चढ़ चुके थे और उन्होंने प्राण त्याग दिये । आश्चर्य होता है कि इतनी बड़ी सिफारिशों के बाद भी यह हाल है तो आमजन का क्या हाल होगा । यह एक उदाहरण नही है ऐसे कई केस होंगे । ऐसे में सरकार व उन जिम्मेदारों से बड़ा सवाल है कि अगर इलाज व आईसीयु के अभाव में किसी की जिंदगी जाती है तो सरकार व जिम्मेदार क्या कर रहे है कोरोना आए हुए एक साल होने को है लेकिन ऑक्सीजन व आईसीयू, वेंटिलेटर जैसी जिंगदी बचाने वाली आवश्यक कार्यो पर जिलों कस्बो में क्या सुविधाएं विकसित की गई, लेकिन इस पर हर कोई चुप्पी साधे हुए है जबकि सरकार इस दिशा में कुछ बेहतर चाहती तो भामाशाह की मदद से काफी कुछ कर सकती थी खैर  जान गंवाने वाले सरकार के लिए सिर्फ आंकड़े बनकर रह गए है । तकलीफ और सबसे बड़ा दर्द तो परिजनों का होता है जो इस दर्द को ताउम्र नही भुला पाएंगे । बता दें, श्री उमाराम पंचारिया अपने पीछे धर्मपत्नी,पांच बेटों व तीन बेटियों सहित भरा-पूरा परिवार छोड़कर गए है ।

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