किन राजनीतिक मजबूरियों के चलते अदावत हो गई विधायक नागर और सोलंकी के बीच

राजनीति अनिश्चितता का खेल है। कब कौनसा नेता किसके पाले में चला जाए, यह नहीं कहा जा सकता है। राजनीतिक मजबूरियां भी एक दूसरे के संग या खिलाफ ले आती है।

जागरूक जनता नेटवर्क
जयपुर। राजनीति अनिश्चितता का खेल है। कब कौनसा नेता किसके पाले में चला जाए, यह नहीं कहा जा सकता है। राजनीतिक मजबूरियां भी एक दूसरे के संग या खिलाफ ले आती है। जयपुर के दो विधायकों की कुछ ऐसी ही कहानी है। दलित वर्ग से आने वाले दूदू से निर्दलीय विधायक बाबूलाल नागर और चाकसू से कांग्रेस विधायक वेदप्रकाश सोलंकी किसी समय सीएम अशोक गहलोत का झंड़ा उठाकर चला करते थे। गत विधानसभा चुनाव से पहले सोलंकी ने पायलट का हाथ थाम लिया था। वहीं नागर आज भी गहलोत के संग है और उन्हें अपना भगवान मानते है। आज ये दोनों विधायक एक दूसरे के खिलाफ वार और पलटवार कर रहे है।

दूदू से चौथी बार विधायक बने हैं नागर
बाबूलाल नागर दूदू से चौथी बार विधायक बने है। नागर को सेवादल का अध्यक्ष रहते 1998 में तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अशोक गहलोत ने राजनीति का पहला मौका दिया। नागर इस सीट से चुनाव जीत गए। इस दौरान गहलोत के नेतृत्व में कांंग्रेस आठ साल बाद राजस्थान में सत्ता में आई थी। कांग्रेस को 156 सीटें मिली और सीएम का सेहरा गहलोत के माथे पर बंधा। इसके बाद नागर साल 2003 और 2008 में भी दूदू से चुनाव जीते। गहलोत दुबारा 2008 में सीएम बने और नागर को डेयरी और खाद्य आपूर्ति विभाग का मंत्री बनाया गया। इसी सरकार के अंतिम साल आते आते विधायक और मंत्री नागर एक महिला से दुष्कर्म के आरोप में फंस गए और उनका मंत्री पद चला गया और वे जेल पहुंच गए। कांग्रेस की डेढ़ सौ सीटें आ सकती थी।

2013 में भाई को मिला मौका
साल 2013 में कांग्रेस ने बाबूलाल नागर का विधानसभा चुनाव में टिकट काट दिया। उनकी जगह कांग्रेस ने उनके जिला प्रमुख भाई हजारी लाल नागर को टिकट दिया,लेकिन वो हार गए। इस दौरान नागर जेल में ही थे। नागर को कांग्रेस से निष्कासित किया जा चुका था। इस दौरान लग रहा था कि नागर का राजनीतिक कैरियर खत्म हो गया।

किस्मत पलटी, 2017 में हो गए बरी और हो गए सक्रिय
विधायक बाबूलाल नागर की किस्मत फिर पलटी और वे अदालत से साल 2017 में बरी हो गए और फिर से बाहर आकर राजनीति में सक्रिय हो गए। नागर को साल 2018 में कांग्रेस के टिकट का दावेदार माना जा रहा था लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया और एक नए चेहरे रितेश बैरवा पर दांव खेला लेकिन ये दांव फेल हो गया और बाबूलाल नागर ने निर्दलीय चुनाव जीत लिया।

वेदप्रकाश को ऐसे मिला पहला मौका
वहीं चाकसू से विधायक वेदप्रकाश सोलंकी पहली बार चाकसू से विधायक बने है। वे 2008 में भी चुनाव लड़ेे थे लेकिन तीसरे स्थान पर रहे। साल 2013 में उन्हें टिकट नहीं मिला। 2018 में उन्हें मौका मिला और वे पहली बार विधायक बने। सोलंकी ने शुरूआत से अपना राजनीतिक आका अशोक गहलोत को माना था। शुरूआत में सोलंकी को जयपुर शहर एनएसयूआई का अध्यक्ष थे। वहीं वर्तमान में पीसीसी के सचिव जसवंत गुर्जर को जयपुर देहात एनएसयूआई का अध्यक्ष बनाया गया था। जबकि बाबूलाल नागर सेवादल में थे। गहलोत ने सोलंकी और नागर का राजनीतिक कैरियर बढाया। सोलंकी गत चुनाव से पहले ही सचिन पायलट के संग चले गए।

दोनों नेताओं की पुरानी अदावत
दोनों विधायकों की राजनीतिक अदावत पुरानी है। इसके पीछे वजह ये हैं कि दोनों की एक ही जाति दलित वर्ग से आते है और उसमें भी ये दोनों एक ही खटीक समाज से है और दोनों की विधानसभा इलाके जुड़ेे हुए है। एक ही जाति वर्ग के होने की वजह से ये दोनों नेता दलित वर्ग के बड़े नेता बनना चाह रहे है। डेयरी लाइसेंस के मामले को लेकर भी दोनों नेता एक दूसरे के खिलाफ खड़े हो गए थे।

एक दूसरे पर वार
विधायक बाबूलाल नागर ने कल सचिन पायलट को लेकर कहा था कि उनकी वजह से कांग्रेस 99 पर ही अटक गई थी। जबकि टिकटों का सही वितरण होता तो कांग्रेस की 150 सीटें आती। हर गलती कीमत मांगती है। हारे हुए और जमानत जब्त प्रत्याशियों को टिकट देने का पायलट को दोषी बताते हुए कहा कि उन्हें तो कांग्रेस आलाकमान से माफी मांगनी चाहिए। इसके बाद सोलंकी ने नागर के लिए कहा था कि नागर खुद ही कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़कर आए है और उनका टिकट क्यों काटा गया था, सबको पता

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